रविवार, 24 फ़रवरी 2013

प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिका एवं मानवीय प्रबंधन का मनोविज्ञान

प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिका एवं मानवीय प्रबंधन का मनोविज्ञान
 दिनेश  कुमार सक्सेना ,पुस्तकालयाध्यक्ष,पी0पी0एन0कालेज,कानपुर
         आज प्राकृतिक आपदायें विश्व में विकसित और विकासशील सभी देशों में किसी न किसी रूप में जीव-जन्तु से लेकर लाखों मनुष्यों के जीवन को अस्त व्यस्त कर रही हैं। भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट, लम्बे समय तक सूखे की सिथति का रहना, बाढ़, हरीकेन, टारनैडो जैसे वायुमण्डलीय तूफान वहीं सुनामी, लैला जैसे समुद्री तूफान व्यापक तबाही का कारण बनते हैं। इस प्राकृतिक आपदाओं का सही-सही पूर्वानुमान तो सम्भव नही है और न ही उनकी रोकथाम, फिर भी विभिन्न आपदाओं से पूर्व सतर्कता, प्रशिक्षण एवं अन्य तैयारी करके इनके प्रकोप के स्तर को निम्न स्तर पर अवश्य लगाया जा सकता है।
       किसी लेखक की लेखकीय विशेषता तब और महान हो जाती है जब वह सामाजिक समस्याओं को केन्द्र में रखकर अपनर सृजन करे और सम्बधिंत समस्या को उजागर कर अपने सृजन के माध्यम से उसका समाधान भी करे। इस दृषिट से डा0वीरेन्द्र यादव को सृजन का शायद ही कोर्इ विकल्प हो। यह प्रकाशिता छ: खण्डों में विभाजित एवं 25 विद्वानों के लेखों को  इस पुस्तक में स्थान दिया गया है।  प्राकृतिक आपदाएं : स्वरूप एवं प्रबन्धन की संम्भावनाएं,भारत में प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप एवं प्रबन्धन के विविध संदर्भ,विकास एवं और प्राकृतिक आपदाओं का प्रबन्धन,पर्यावरण एवं प्राकृतिक आपदाओं का प्रबन्धन :एक विश्लेषण,साहित्य में प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप एवं उनका प्रबन्धन, प्रमुख तथा गौण प्राकृतिक आपदाएँ एवं उनका प्रबंधन के द्वारा प्राकृतिक आपदाओं के विविध सरोकारों की चर्चा की गयी है। डा. आनन्द कुमार खरे एवं डा. वीरेन्द्र सिंह यादव के सम्पादन में निकली यह पुस्तक प्राकृतिक आपदाओं के विविध परिदृश्यों को निरूपित करती है।
       वर्तमान एवं ऐतिहासिक श्रोतों  के परिपे्रक्ष्य को उजागर करती इस पुस्तक तके अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।प्राकृतिक आपदायें आकसिमक रूप से आती हैं और मानव सभ्यता, सम्पतित, सामाजिक, आर्थिक ढ़ाँचे को तहस-नहस करके व्यापक विनाशकारी प्रभाव डालती हैं। यहीं कारण है कि आज के वैज्ञानिक युग में भी मनुष्य आपदाओं के सामने असहाय नजर आने लगता है। जैसे बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन, सूखा, तूफान, पर्वतीय क्षेत्रों में हिमस्खलन, बादलों का फटना आदि। प्राकृतिक आपदाओं का सामना प्रत्येक वर्ष करना पड़ता है। देश का लगभग 60 प्रतिशत भाग भूकम्प की आशंका वाला क्षेत्र है। जनवरी 2001में गुजरात का भूकम्प, दिसम्बर 2004 का सुनामी का प्रकोप, जुलार्इ 2005 की मुम्बर्इ की बाढ़ आदि आपदाओं के कहर को हम भूले नही हैं।
        पुस्तक का निष्कर्ष है कि प्रकृति और विकास का असंतुलन ही वह कारण है जो प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार है। विकास और विध्वंश की बेसुरी जुगलबन्दी हमें यह सोचने के लिए मजबूर कर रही है कि पहाड़ों के भूकम्पीय क्षेत्रों में हमें क्या बड़े-बड़े बाँध बनाने चाहिए। जल विधुत परियोजनाओं की सुरंगों को गाँवों के नीचे से गुजरने के कारण जहाँ भूस्खलन में वृद्धि हुर्इ है। प्रकृति से खिलवाड़ के कारण ही वर्तमान समय में मनुष्य वर्ष भर आपदाओं का सामना करता रहता है। हमारी अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि भी एक आपदा ही है। बढ़ती आबादी के सामने हमारी विकास यात्रा बौनी हो गयी है। आज रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा, चिकित्सा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का अभाव है। शहरों में अनियोजित विकास का ढाँचा आपदाओं के सामने असहाय नजर आता है। इस पुस्तक में चेतावनी के रूप में सजग करने की कोशिश की गयी है कि आज विकास के नाम पर जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है। उससे अभूतपूर्व पर्यावरण असंतुलन पैदा हो गया है। प्रकृति का यह पर्यावरणीय असंतुलन ही प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार है। प्रत्येक वर्ष हमारे जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हमने जंगल काट डाले हैं। वहीं चार और छह लेन की आधुनिक सड़कों का निर्माण के लिए भी देश में लाखों छायादार वृक्षों को काटा गया है जिससे मौसम चक्र तो प्रभावित हुआ ही है। साथ ही जल स्तर भी बहुत नीचे पहुँच गया है। यही कारण है कि आज देश में गाँवों से लेकर नगरों तक में जल का अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया है। अधिक से अधिक टयूबवैल लगाकर पानी का दोहन किया जा रहा है। वही तालाब,कुएँ जैसे परम्परागत जल संग्रह के साधनों का असितत्व मिटाया जा रहा है।
       इस पुस्तक में  सम्पादकीय के माध्यम से अपना नजरिया प्रस्तुत करते डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने कहा है कि आपदायें चाहे प्राकृतिक हों या मानव जनित, प्रबन्धन की दृषिट से क्षणिक प्रयासों से इनका समाधान संभव नही है। आपदा प्रबन्धन की दूरगामी योजना, मजबूत चेतावनी तंत्र, केन्द्र एवं राज्य सरकारों के मध्य अच्छा सामंजस्य तथा प्रशिक्षण को उच्च स्तरीय सुविधाओं के केन्द्रों का विकास बहुत अनिवार्य है। साथ ही आम नागरिक एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक, आर्थिक संस्थाओं को भी आपदा प्रबन्धन की विशेषज्ञता से जोड़ना चाहिए ताकि वे आपदा के समय अपनी व्यापक भूमिका सुनिशिचत कर सकें। हमें प्राथमिक स्तर से ही नैतिक शिक्षा एवं अलग विषय के रूप में आपदा प्रबन्धन को प्राथमिकता देना चाहिए ताकि आपदा की विभीषिका के समय प्रत्येक व्यकित अंदर से यह अनुभव करें कि आपदा से प्रभावित लोगों की सहायता एवं रक्षा करना उसका भी दायित्व है। केवल सरकारी विभागों एवं योजनाओं के सहारे हम आपदाओं के व्यापक प्रकोप का सामना कदापि नहीं कर सकते हैं। कुशल मानवीय प्रबन्धन के द्वारा हम ऐसी परिसिथति का निर्माण करने में सफल हो सकेंगे। जिससे प्राकृतिक एवं मानव जनित आपदाओं से आम नागरिक स्वयं को निशिचत ही सुरक्षित अनुभव करेंगे। प्राकृतिक आपदाओं जैसी विभीषिका पर शोधपूर्ण पुस्तकों की कमी को प्रस्तुत पुस्तक में बेहतरीन शोध लेखों के माध्यम से पूरा करने का प्रयास किया है।
पुस्तक का नाम-प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिका एवं मानवीय प्रबंधन का मनोविज्ञान
संपादक- डा. आनन्द कुमार खरे, डा.वीरेन्द्रसिंह यादव
पेज-16+269-285
ISSN.978.81.8455.334.5
संस्करण-प्रथम.2011
मूल्य-500.00
ओमेगा पबिलकेशन्स,43784ठएळ4एजे.एम.डी,हाउस,मुरारी लाल स्ट्रीट,अंसारी रोड, दरियागंज, नर्इ दिल्ली-110002

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

उत्तर आधुनिकता : विचार और मूल्यांकन

      उत्तर आधुनिकता  : विचार और मूल्यांकन
डा0 सियाराम
असि प्रोफेसर -हिंदी,तिलक महाविद्यालय , औरैया,उ.प्र.
 साहित्य के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करने वाले डा.वीरेन्द्रसिंह यादव ने शायद ही कोर्इ क्षेत्र छोड़ा हो ,जिस पर अपना सृजन न किया हो,इधर साहित्य की चर्चित नूतन विधा-उत्तरआधुनिकता पर आर्इ यह संपादित पुस्तक चर्चा के केन्द्र में है।   उत्तर आधुनिकता : विचार और मूल्यांकन नामक पुस्तक में इसे पाच उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है-जैसे उत्तर आधुनिकता:पृष्ठभूमि,प्रतिफलन और अध्ययन की सीमाएं,हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता कुछ अक्स, कुछ अन्देशे, उत्तर आधुनिकता कथ्य और शिल्प के नये आयाम,आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता:कुछ विचार,कुछ प्रश्न,उत्तर आधुनिकता के परिवर्तित भावबोध: मूल्यांकन और तकनीक के अहम सवाल।बीस अध्यायों में विभाजित पुस्तक में  उत्तर आधुनिकता के लगभग सभी पहलुओं पर विचार तो हुआ ही है इसके साथ ही इसके दुष्परिणामों को भी अपने सम्पादकीय के माध्यम से डां.वीरेन्द्र ने इसका विवेचन एवं विश्लेषण किया है-अर्थात उत्तर आधुनिकतावाद.................. वैसे उत्तर आधुनिकता की अवधारणा और इससे सम्बनिधत सिद्धांत अस्पष्ट हैं क्योंकि इसके समर्थक किसी सर्वसम्मति अर्थ के लिए राजी नहीं हैं। उत्तर आधुनिकता का बहुत बड़ा सरोकार, कला, संस्कृति और पुरातत्व से है। इसकी घनिष्ठता साहित्य कला से भी है। हालाकि हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता  का प्रवेश बहुत पहले हो चुका है। और अब हमारे अनुभव उत्तर आधुनिक बन रहे हैं।
       पुस्तक की मान्यता है कि  हिन्दी में उत्तर आधुनिकतावाद के आगमन की तुलना असितत्ववाद के आगमन से की जा सकती है। सातवें दशक में जिस तरह बहुत से लोग स्वयं को नया और दूसरों से आगे बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के लिए असितत्ववादी शब्दावली में लिखने बोलने लगे थे। उसी तरह आज बहुत से लोग उत्तर आधुनिकतावादी शब्दावली में लिखने बोलने लगे हैं। आज बात-बात पर उसी तरह देरिदा, फूको, ल्योतार आदि के नाम लिये जाते हैं, जिस तरह असितत्ववाद के आगमन के समय सात्र्र, काम, काफ्फा आदि के नाम लिये जाते थे। असितत्ववाद और उत्तर आधुनिकतावाद में एक रोचक समानता यह है कि असितत्ववाद और उत्तर आधुनिकतावाद दोनों का जन्म यूरोप में हुआ। लेकिन असितत्ववाद की तरह उत्तर आधुनिकतावाद भी अमेरिका के ही रास्ते से भारत में आया।
ल्योतार ने 'उत्तर-आधुनिक को 'आधुनिक का विरोधी बताते हुए कहा कि वह प्रत्येक विज्ञान आधुनिक है जो किसी महावृतांत के सन्दर्भ से अपनी वैधता प्राप्त करता है। जबकि 'उत्तर-आधुनिक वह है जो महावृतांतों के प्रति शंकालु होता है।
पशिचम के ऐसे भाषा चिंतक, जो स्वयं को 'उत्तर माक्र्सवादी कहकर माक्र्स से अपना नाता जोड़ने की कोशिश करते हैं, दरअसल वे माक्र्स के नही नीत्शे के अनुयायी हैं। हिन्दी के कुछ उत्तर आधुनिकतावादी भी स्वयं को गर्व से 'उत्तर माक्र्सवादी कहते हैं। लेकिन माक्र्स से वे अपना नाता सिर्फ इसलिए जोड़ते हैं कि माक्र्सवाद विरोधी प्रचार करते समय वे कुछ विश्वसनीय नजर आयें। उत्तर आधुनिकतावादी बड़े पहुँचे हुए खिलाड़ी हैं। वे स्वयं किसी नियम कायदे में विश्वास नहीं रखते, लेकिन दूसरों के लिए नियम कायदे खूब बनाते हैं। जाहिर है कि उत्तर आधुनिकतावाद भाषा, साहित्य, कला आदि से सम्बनिधत कोर्इ फैशन या आन्दोलन नही, बलिक एक प्रकार की राजनीति है। इसे रचना और आलोचना की एक नयी पद्धति मात्र समझना भूल है। यह आज के पूँजीवाद की विचारधारा है और इसे इसी रूप में समझना आवश्यक है।
अपने शोध पत्रों के माध्यम से विद्वानों ने माना है कि उत्तर-आधुनिकतावाद कोर्इ तर्कसंगत विचारधारा नही है। लेकिन स्वयं उत्तर आधुनिकतावादी लोग जो इसे अपनाना अनिवार्य बतलाते हैं और इसकी असंगतियों को जानते हैं।
हिन्दी में इसके प्रमुख प्रचारक सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक 'उत्तर आधुनिकता और उत्तर संरचनावाद (1994) में उत्तर आधुनिकतावाद के बारे में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये हैं कि - उत्तर आधुनिकता, आधुनिकता का विस्तार भी है और अंतिम बिन्दु भी है। आधुनिकता के दौर से काफी अलग वह एक उत्तर साम्राज्यवादी सिथति है। वह एक भूमण्डलीय अवस्था है जिसमें हम सब शामिल हैं। वह 'ज्ञान की अवस्था के बदल जाने का लक्षण है। वह हमारे सांस्कृतिक व्यवसाय के बदल जाने का नाम है। उत्तर आधुनिकता बहुत से भिन्न लोगों के लिए बहुत से भिन्न अर्थ रखती है। उत्तर आधुनिकता यह सब है और इसके अलावा भी बहुत कुछ है। लेकिन यह शायद बाकी हर चीज से ज्यादा एक मनोदशा भी है।
पुस्तक में अनेक प्रश्न एवं भ्रम अभी भी उत्तर आधुनिकता को लेकर बने हुए हैं जैसे - लेकिन क्या उत्तर आधुनिकता सचमुच हर चीज का खंडन करती है ? हर चीज को खारिज करती है ? क्या वह पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण, दमन, उत्पीड़न, अन्याय, अनुचित दबाव का विरोध करती है ? नहीं, कभी नहीं ! उत्तर आधुनिकतावाद आज के पूँजीवाद की विचारधारा है, जो ज्ञान की जगह अज्ञान का, तर्क की जगह तर्कहीनता का और विवेक की जगह विवेकहीनता का प्रचार-प्रसार करती है। इसका उददेश्य लोगों को समाजवाद और साम्यवाद की दिशा में जाने से रोकना तो है ही, पूँजीवादी जनवाद को समाप्त करना भी है। उत्तर आधुनिकतावाद का सबसे प्रमुख तत्व है। अभिजनवाद (एलीटिज्म), जिसके द्वारा विशिष्ट और सामान्य लोगों में भेद किया जाता है और सामान्य लोगों को-अर्थात गरीब, शोषित, उत्पीडि़त जनता और उसके पक्षधरों को नीची नजर से देखा जाता है। रिचर्ड रोर्टी, जो उत्तर आधुनिकतावाद के एक प्रमुख चिंतक माने जाते हैं, अपनी पुस्तक 'कांटिजेंसी आयरनी एण्ड सालिडैरिटी (1989) में बौद्धिक और सामान्य लोगों में यह भेद बतलाते हैं कि बौद्धिक लोग 'आयरनिस्ट विडंबनावादी होते हैं, जबकि सामान्य लोग जीवन को गंभीरता से लेते हैं। आजकल हिन्दी के लेखकों को यह अभिजनवाद बहुत प्रभावित कर रहा है। गंभीर लेखन उत्तर आधुनिकतावादी लोगों की नजर में पुराना, पिछड़ा हुआ और उपेक्षणीय लेखन है। श्रेष्ठ लेखन वह है, जो विशिष्ट पाठकों के लिए किया जाये, मगर हल्का-फुल्का हो, जिसमें व्यंग, विडंबना, भेदस और आत्मोपहास का मिश्रण हो।
स्पष्ट है कि उत्तर आधुनिकतावाद केवल साहित्य, कला और संस्कृति तक सीमित नहीं, बलिक इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण जीवन से है। इसका सम्बन्ध वर्तमान से ही नहीं, बलिक निकट तथा दूर के भविष्य से भी है। लेकिन उत्तर आधुनिकतावाद के प्रति यह रवैया अपनाना भी उचित नही कि यह कोर्इ फैशन है और इसकी परवाह नही करनी चाहिए। इसे अच्छी तरह समझे बिना ही खारिज कर देने की प्रवृत्ति तो गलत है ही, इसको 'साम्राज्यवादी षड़यंत्र समझकर खारिज करने की प्रवृत्ति और भी ज्यादा गलत है। यह मानना ठीक नही कि उत्तर आधुनिकतावादी तमाम लेखक, विचारक षड़यंत्रकारी या साम्राज्यवाद का एजेन्ट हैं। विचारधारायें किसी के आदेश पर या किसी षड़यंत्र के तहत पैदा नही होती। विचारधारायें भौतिक जगत की वास्तविक परिसिथतियों में किसी वर्गीय आवश्यकता से उत्पन्न होती हैं।
उत्तर आधुनिकता कोर्इ फैशन नहीं, बलिक आज के पूँजीवाद की एक वैचारिक तथा सांस्कृतिक अभिव्यकित है, जिसको समझे बिना आज के पूँजीवाद को समझना संभव नहीं। उत्तर आधुनिकता का जन्म किसी भी देश में हुआ हो, भारत के प्रभुत्वशाली अभिजन वर्ग ने इसे अपना लिया है। उत्तर आधुनिकता में कुछ ऐसा भी है, जो उपयोगी भी हो सकता है। उत्तर आधुनिकता सकारात्मक रूप में नहीं तो एक नकारात्मक उत्प्रेरक के रूप में तो उपयोगी हो ही सकती है। उत्तर आधुनिकता ने सबसे बड़ा लाभदायक काम यह किया है कि एक नये ढंग से सचेत और सक्रिय होने की चुनौती पैदा करने के साथ-साथ नयी बहसों और नये आन्दोलनों की संभावना भी पैदा कर दी है। जिन्हें साहित्य की समझ को विकसित करना है वह भी उत्तर आधुनिकता जैसे महत्वपूर्ण बिन्दु को पकड़ना हो तो समीक्षक डा0 वीरेन्द्र द्वारा सम्पादित इस कृति को अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि बेस बुक(आधार पुस्तक) के लिए इससे अच्छी किताब शायद ही बाजार में कोर्इ उपलब्ध हो।
                 कुल मिलाकर पुस्तक अपने विजन को विषय वस्तु की दृषिट से बिल्कुल स्पष्ट करती है। साथ ही उत्तर आधुनिकता की समझ को दो टूक शब्दों में व्यक्त भी करती है। प्राध्यापकों,शोध-छात्रों एवं जिज्ञासु पाठकों को यह पुस्तक उपयोगी होगी, ऐसी मेरी धारणा है।

 पुस्तक का नाम-उत्तर आधुनिकता : विचार और मूल्यांकन
 संपादक-डा.वीरेन्द्रसिंह यादव
पेज-20+248-26
ISSN.978.81.8455.337.6
संस्करण-प्रथम.2011,मूल्य-650.00
ओमेगा पबिलकेशन्स,43784ठएळ4एजे.एम.डी. हाउस,मुरारी लाल स्ट्रीट,अंसारी रोड, दरियागंज, नर्इ दिल्ली-110002


 

उत्तर आधुनिकता की पृष्ठभूमि : कुछ विचार, कुछ प्रश्न

उत्तर आधुनिकता की  पृष्ठभूमि : कुछ विचार, कुछ प्रश्न

कुमार वीरेन्द्र
सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
जी0 एल00 कालेज, (नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविधालय)
मेदिनीनगर, पलामू, झारखण्ड, पिन - 822102
उत्तर आधुनिकता की परिभाषा महान वृतान्तों में अविश्वास करना है। हमें सकलता के खिलाफ युद्ध छेड़ देना चाहिए, इसकी अपेक्षा हमारी सक्रियता विशिष्टता के प्रति होनी चाहिए। वास्तव में उत्तर आधुनिकता केवल अधिकृत व्यकितयों का औजार ही नही है, इसका लक्ष्य विशिष्टता के प्रति हमें संवेदनशील करना है और वे वस्तुएं जो हमें अनुपयुक्त लगती हैं, उन्हें उदारता के साथ स्वीकार करने की योग्यता पैदा करना है। इस अवधारणा का प्रारम्भ साहित्य, कला, फिल्म और समीक्षा के साथ हुआ है। इसका प्रारमिभक स्वरूप दार्शनिक है, किन्तु बाद में इस दर्शन ने सामाजिक सिद्धान्त के क्षेत्र को प्रभावित किया। विखण्डनवाद ने सर्वाधिक प्रहार विभिन्न क्षेत्र के पूर्व स्थापित एवं चिरपरिचित प्रारमिभक ग्रन्थों पर किया है। उत्तर आधुनिकतावाद एक सांस्कृतिक पैराडिम अर्थात माडल है। यह संस्कृति सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रक्रियाओं से जुड़ी हुर्इ है। इसकी अभिव्यकित जीवन की विभिन्न शैलियों में अर्थात कला, साहित्य, दर्शन आदि में देखने को मिलती है। उत्तर आधुनिकता की संस्कृति को सामाजिक आयोजन और आर्थिक परिवर्तन में देखा जा सकता है। इसकी उपसिथति प्रत्यक्षवाद, उत्तर संरचनावाद और विखण्डन में भी पायी जाती है। इन्हीं महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रस्तुत पुस्तक विस्तार से प्रभाव डालती है।
       पुस्तक के अनुसार उत्तर आधुनिकतावाद के तीन केन्द्रीय प्रस्ताव हैं - समग्रवादी सार्वभौमिक तथ्यों का नकार, तर्कवाद का नकार और आधुनिकतावाद की सक्षमता का नकार। इससे अब तक के समाजशास्त्र की अवधारणायें चुनौती पाती हैं और काम पाती हैं। पशिचमी दुनिया ने अपनी जवानी में एक सपना पाला। एक ऐसा केन्द्रीकृत विश्व जिसमें एक सार्वभौमिक सिद्धान्त में हर चीज डूब जाती है। लेकिन यह केन्द्रीकृत विश्व और कुछ नहीं पूँजीवादी विश्व ही है। उत्तर आधुनिकतावाद कहता है कि इस पूँजीवाद के महाकाय में हर चीज शामिल है। 'पोस्टमाडर्निज्म आफ द कल्चरल लाजिक आफ लेटकैपिटलिज्म में एक जगह जेमेसन कहते हैं कि उत्तर आधुनिकतावाद पूँजीवाद के इसी 'एपीथियोसिस से शुरू होती है, वह पूँजीवाद के उस सर्वव्यापकत्व में निहित है, जिसके तहत पूँजीवाद गैर-पण्यीय क्षेत्रों में भी जा पहुँचा है और हर चीज को पण्य बना डाला है।
 पुस्तक में सम्पादकीय के माध्यम से  डा. वीरेन्द्र का मानना है कि आधुनिकता का आधार मानववाद, तर्कनिष्ठा, बौद्धिकता तथा वैज्ञानिकता एवं सार्वभौमिकता है। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद भी आधुनिकता की ही देन हैं। उत्तर आधुनिकता ने आधुनिकता की सीमाओं को पहचाना है। यह कहीं उसे काटती है, कहीं साझेदार है और कहीं आगे भी जा रही है। इन्ही सरोकारों को दृषिटगत रखते हुए डा. वीरेन्द्र सिंह यादव ने प्रस्तुत पुस्तक को पाच उपशीर्षकों के अन्तर्गत-उत्तर आधुनिकता की  पृष्ठभूमि और अध्ययन की समस्याएं,साहितियक  परिपे्रक्ष्य में  उत्तर आधुनिकता  के  कुछ अक्स ,उत्तर आधुनिकता : कथ्य और शिल्प के नये आयाम,आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता : कुछ विचार, कुछ प्रश्न, उत्तर आधुनिकता  के परिवर्तित भाव बोध : मूल्यांकन और तकनीक के अहम  सवाल रखकर उत्तर आधुनिकता के विभिन्न पक्षों को  रखा है।
       इस पुस्तक में उत्तर आधुनिकता के मूल तत्व हैं-अस्वीकार, विखण्डन और अविवेक । अब तक मानव समाज ने जो कुछ सोचा-विचारा है, जिस मूल्य परम्परा को निर्मित किया है, जीने के लिए भौतिक और मानसिक आतिमिक  स्तर पर जो कुछ बनाया है, उस सबको अविवेकपूर्ण विखणिडत करके अस्वीकृत कर देना ही उत्तर आधुनिकता है। उत्तर आधुनिक विचारक हमें बताते है कि केवल शब्द होते हैं, उनसे अलग उनका कोर्इ अर्थ नहीं होता है। उत्तर आधुनिकता का एक पक्ष 'पर संसार की वकालत करना है। इसी कारण उत्तर आधुनिकता विकेन्द्रीकरण की पक्षधर है। वह हर प्रकार की सम्प्रभुता का विरोध करती है। इसीलिए वह लोकमत और जातिगत पहचानों को उभारती है। लेकिन हमारे देश में जो जातिगत सचेतता दिखार्इ देती है, वह उत्तर आधुनिकता की देन नही है। मजेदार बात यह है कि पशिचम में, जहाँ से उत्तर आधुनिकता का दर्शन आया है, प्रजाति का तो महत्व है, जाति का नही। वास्तव में उत्तर आधुनिकता की काया व्यावसायिक चेतना से निर्मित है और वह व्यावसायिक चेतना परम्परागत मूल्यों,प्रकृति और सौन्दर्य को जौहरी की तरह तराशकर बाजार में उसका मूल्य उगाहने में विश्वास करती है।
          कुल मिलाकर प्रस्तुत पुस्तक न केवल आधुनिकता के साथ परम्परा का मिश्रण तो करती है  इसके साथ ही उत्तर आधुनिकता के दर्शन, परम्परागत मूल्य और मानवेतर विश्वासों को जमीनी तहों से निकालकर उस पर वर्तमान की पालिश करके  एक नवीन व्याख्या भी करती है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि उत्तर आधुनिकता जैसी विधा पर उभरती तस्वीर फिल्म की तरह हमारे समक्ष कौंध रही है।
 पुस्तक का नाम-उत्तर आधुनिकता की पृष्ठभूमि :  कुछ विचार ,कुछ प्रश्न
संपादक-डा.वीरेन्द्रसिंह यादव
पेज-19+303-322
ISSN.978.81.8455.336.9
संस्करण-प्रथम.2011
मूल्य-795.00
ओमेगा पबिलकेशन्स,43784ठएळ4एजे.एम.डी.हाउस,मुरारी लाल स्ट्रीट,अंसारी रोड, दरियागंज, नर्इ दिल्ली-110002

       





 

भारत में शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियाँ

         भारत में  शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियाँ
डा0 विजय कुमार वर्मा
प्रवक्ता -समाजशास्त्र विभाग
0प्र0 विकलांगउद्धार डा0 शकुन्तला मिश्रा वि0वि0] मोहान रोड, लखनऊ।

               आज तीव्रगति से विशेषकर तकनीकी एवं उच्च शिक्षा में हो रहे निजीकरण से अध्यापकों एवं छात्रों के शोषण में वृद्धि हुर्इ है, प्रवेश सम्बन्धी अनियमितताओं आदि के कारण उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लोकतंत्रवादी समानता आहत हो रही हैं जिससे नि:संदेह गुणात्मकता प्रभावित हो रही है। अत: शिक्षा के निजीकरण को नियंत्रित करते हुये स्ववित्त पोषित संस्थाओं के अंधाधुंध अनुमोदन को सीमित करने पर भी सरकार  को शिí के साथ विचार कर इसमें अंकुश लगाना होगा। डा.वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा संपादित इस पुस्तक के द्वारा शिक्षा से सम्बनिधत विभिन्न सरोकारों को रेखांकित करने की कोशिश की है।

       वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पड़ी करते हुए सम्पादकीय में डा. वीरेन्द्र सिंह यादव ने लिखा है कि इसमें कोर्इ दो राय नहीं कि दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी विशेषकर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्à लगाती है। 180 मिनट में लिखी गयी सम्पूर्ण उत्तर पुसितका का मूल्यांकन 3-4मिनट में हो जाता है जो आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ हास्यास्पद भी है। इसके लिये हमारा व्यकितगत सुझाव है कि वर्ष भर की विधार्थी की मेहनत को कुछ मिनटों में न मूल्यांकित करके वर्ष भर उनका सतत मूल्यांकन किया जाये। उपरोक्त पुस्तक नौ उपशीर्षकों -परम्परागत शिक्षा का स्वरूप,अवधारणा एवम विकास प्रकि्रया,  भारत में  शिक्षा के बदलते आयाम (प्राथमिक, परिषदीय एवम माध्यमिक शिक्षा के विशेष परिप्रेक्ष्य में), भारत में शिक्षा के प्रति अंगे्रजों का दृषिटकोण,भारतीय संविधान में शिक्षा अधिकार अधिनियम : एक तात्वविक  विश्लेषण , भारत में उच्च शिक्षा  : समस्याएं एवम समाधन, भारत में  महिला (स्त्री) शिक्षा के बदलते आयाम,शिक्षा में अग्रज एवं अनुज पीढी़ का योगदान,बदलते परिदृश्य में में शिक्षा चिन्तन के विविध सरोकार, आधुनिक  भारत में शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियां में विभाजित है। जो शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य की हकीकत को व्यक्त करती है।

           इसमें कोर्इ दो राय नहीं कि भारतीय समाज अनेक जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र एवं वगो± में विभक्त है एवं ऐसे सभी समूहों को एक सूत्र में पिरोने में उच्च शिक्षा एक प्रभावशाली माध्यम है। ज्ञान आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2015 तक उच्च शिक्षा के लिये भारत को 1500विश्वविधालयों की आवश्यकता होगी जो वर्तमान में मौजूद लगभग 350 विश्वविधालयों से लगभग तीन गुना अधिक है। इसी प्रकार 50 राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों   की आवश्यकता होगी जो उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान कर सकें। लेकिन वहीं दूसरी ओर यह चिन्ता एवं अफसोस की बात है कि भारत में गणतंत्र के 64 वषो± बाद भी देश में उच्च शिक्षा में अध्ययनरत छात्रों की संख्या मात्र कुछ ही करोड़ के आस-पास ही है यानि कुल जनसंख्या का केवल 5-6  प्रतिशत हिस्सा ही हमारे यहाँ उच्च शिक्षित वर्ग में आता है जबकि विकसित देशों में यह 20 प्रतिशत के आसपास है।
        पुस्तक की मान्यता है कि  चाहे बुनियादी शिक्षा प्राथमिक की बात हो या आधार शिक्षा माध्यमिक या फिर तकनीकी शिक्षा की बात हो या फिर उच्च शिक्षा की बात हम आखिर वैशिवक परिप्रेक्ष्य की तुलना में क्यों पिछड़ते जा रहे हैं; शिक्षा के मदिंरों में आज व्यवसायिकता एवं माफियावाद क्यों हावी हो रहा है? फिर सरकार एवं समाज के आम बुद्धिजीवियों के द्वारा बार-बार गुणवत्ता की बात कर प्रश्न चिन्à खड़े करना कहाँ तक उचित अनुचित है?
         हमें उम्मीद है कि शिक्षित युवा ही नहीं बलिक शिक्षा जगत से सम्बद्ध ,विद्वतजनों व समाज के प्रबुद्ध नागरिकों को  शिक्षा जैसे ज्वलंत विषय पर  इन  तितालीस विद्वानों के बहुमूल्य एवं सारगर्भित विचार अवश्य पसंद आएगें ।

 पुस्तक का नाम- भारत में  शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियाँ   संपादक-डा.वीरेन्द्रसिंह यादव
पेज-16&360¾376
ISSN.978-81-8455-292-8
संस्करण-प्रथम.2011-मूल्य-795-00
ओमेगापबिलकेशन्स-43784ठएळ4एजे.एम.डी.हाउस,मुरारी लाल स्ट्रीट,अंसारी रोड, दरियागंज, नर्इ दिल्ली-110002