बुधवार, 20 अप्रैल 2011

भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

भारतीय मुसलमान: मिथक एक यथार्थ
डॉ चन्द्रमा सिंह
पुस्तक - भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा
सम्पादक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन, 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 750.00
पृष्ठ : 14+363=377
ISBN: 81.7487.650.2


समकालीन समाज विज्ञान एवं साहित्यिक परिदृश्य में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव का नाम किसी औपचारिक परिचय का मोहताज नहीं हैं। हालाँकि डॉ. वीरेन्द्र यादव एक सामाजिक चिंतक एवं गद्यकार के रूप में जाने जाते हैं लेकिन आपके रचनात्मक क्रियाकलाप को किसी विधा विशेष की हदबंदी में नहीं बाँधा जा सकता है। आपने सामाजिक समस्याओं एवं समसामयिक समय के अनेक ज्वलंत मुद्दों को अपनी लेखनी का मुख्य विषय बनाया है। समय एवं समाज की नब्ज को बारीक से देखने वाले डॉ. वीरेन्द्र यादव ने एक ऐसा रचना संसार निर्मित किया है जिसमें तत्कालीन युग का पूरा परिवेश ही प्रतिबिम्बित हो उठा है।
इसी संदर्भ में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की सम्पादित पुस्तक भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा को लिया जा सकता है। विश्व के सबसे बड़ा लोकतंत्र का पहरी भारत अपनी विशेषताओं के कारण अतीत में विश्व का सिरमौर माना जाता था ,वहीं यहाँ वर्तमान समय में साम्प्रदायिक सदभाव एवं भाईचारे की भावना एवं विचारधारा को लेकर आपसी खेमेबन्दी हो गयी है। लेखक की प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से यही संदेश है कि अपनी स्वार्थ सिद्ध के लिये लोग आपस में ऊँचनीच का बंटवारा कर देते है जबकि ईश्वर ने सभी प्राणियों को श्रेष्ठ एवं समान बनाया है। केवल मानव ने इसमें भेद इसलिये किये है कि वह उनसे श्रेष्ठ एवं आगे बढ़ जाए।
भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा नामक इस सम्पादित पुस्तक में 63 विद्वानों के लेखों को समाहित किया गया है जिसमें भारत के हर प्रान्त एवं शिक्षा जगत के विभिन्न क्षेत्रों सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक क्षेत्रों से जुड़े विषय विशेषज्ञों ने अपने विचारों को निष्पक्ष भाव से रखा है। 363 पृष्ठ की इस पुस्तक में सम्पादक ने इस आलेखों, शोधपत्रों को 8 भागों में वृहत्तर मुस्लिम समाज: पुराने प्रश्न, नये परिप्रेक्ष्य, राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता एवं भारत विभाजन, मुस्लिम नारी: आज, कल, और आज, साहित्यिक परिदृश्य में मुसलमान, संगीत, कला एवं शिक्षा में मुस्लिम समाज का योगदान, मुस्लिम संस्कृति का हिन्दू संस्कृति पर प्रभाव। 21वीं सदी में मुस्लिम नेतृत्व की सीमाएं और सम्भावनायें, मुसलमान और आधुनिक दलित चिंतन नाम उपखण्डों में बाँटकर पाठकों के लिये थोड़ा आसान कार्य कर दिया है । लेखक ने अपने सम्पादकीय में स्पष्ट रूप से कहा कि इस्लाम विश्व के किसी भी धर्म की अपेक्षा अपने अन्दर अनेक विशेषतायें एवं मानववाद की अवधारणा को लेकर आया है और जितना कम समय में अत्यधिक सुदीर्घकालीन प्रचार और प्रसार भारत में इस्लाम ने किया उतना कोई अन्य आक्रमण करने वाली (आक्रान्ता-जाति) या संस्कृति ने नहीं किया, यहाँ तक कि अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में आने वाली पश्चिमी-पुर्तगाली, फ्रांसीसी, ब्रिट्रिश जातियाँ और ईसाई धर्म संस्कृति भी उतना प्रचार-प्रसार नहीं कर पायीं लेकिन उन साम्राज्यवादी शक्तियों ने हमारे समाज में भारतीयों के बीच फूट डालने के लिये प्रत्येक अवसर का लाभ उठाते हुये उन्हें दो परस्पर शत्रु खेमों में विभाजित कर दिया। पश्चिमी शक्तियों (अंग्रेजों ) की इस कुटिल पृथकतावादी मनोवृत्ति से आकर्षित होने के, वे मातृभूमि का विभाजन करके अपने लिये एक अन्य देश बनाने में सफल हो गये तथा इस समुदाय के जिन लोगों ने अपने जन्म स्थान में रहने का निर्णय किया वे ही मुस्लिम अल्पसंख्यक कहलाये।
पुस्तक के लगभग सभी लेखकों ने मुस्लिम समाज के प्रति भेदभाव एवं उनके बारे में फैले भ्रमों, गलतफहमियों, पूर्वाग्रहों एवं राष्ट्र के प्रति प्रेम को नारी की से विश्लेषण किया है। यह बात सच है कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यदि हम आज देखें तो विश्व का शायद ही ऐसा कोई कोना न होगा जहाँ मुस्लिम या इस्लाम धर्म के अनुयायी न रहते हों।
कुल मिलाकर प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय मुसलमानों के ऐतिहासिक एवं सामाजिक कार्यों को गहराई से विवेचित किया गया है, और उनके द्वारा किये गये सकारात्मक सहयोग को ,हादसों एवं घटनाओं के द्वारा लेखकों ने प्रमाणिक अमली जामा पहनाया है। प्रस्तुत पुस्तक शोध छात्रों, बुद्धिजीवियों एवं मुस्लिम समाज के बारे में जिज्ञासु विद्वानों के लिये मील का पत्थर साबित होगी ऐसा में व्यक्तिगत रूप से मानती हूँ।


इक्कीसवीं सदी में मुसलमान चिन्तन एवं सरोकार--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

इक्कीसवीं सदी में मुसलमान चिन्तन एवं सरोकार
डॉ.सबीहा रहमानी
पुस्तक -इक्कीसवीं सदी में मुसलमान चिन्तन एवं सरोकार
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 1500.00(दो भागों में )
पेज - 48 + 336, 50 + 331 = 765
ISBN - 978-81-8455-249-2

जिजीविषा, जीवटता, साहस, दृढ़ इच्छा शक्ति, आशा, आत्मविश्वास ही वे वस्तुएं है जो व्यक्ति की शक्तियों को जाग्रत करती हैं। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव इन शक्तियों के पुंज से दिखते हैं। इसलिए वे लिखते और लिखवाते हैं। डॉ. वीरेन्द्र यादव निरंतर संकल्परत हैं कि सृजनात्मकता के क्षेत्र में गुणवत्ता का मापदंड प्रतिभा ही बनी रहे, चाटुकारिता नहीं। वास्तव में कठिन चुनौतियों के बीच जिस संकल्प शक्ति के साथ वे संस्कृति और साहित्य की रक्षा, सम्मान और सम्पुट के लिए कार्यरत हैं वह स्तुत्य है।
इक्कीसवीं सदी में मुसलमान: चिन्तन एवं सरोकार नामक दो खण्डों में प्रकाशित पुस्तक में लेखक ने देश के प्रथम खण्ड में तैंतीस विद्वानों के आलेख एवं द्वितीय खण्ड में तैंतीस विद्वानों अर्थात् छाछठ विद्वानों के लेखों का संग्रहकर भारतीय मुसलमानों के धर्म, संस्कृति, समाज, शिक्षा एवं राष्ट्र में उनके द्वारा दिए गए योगदानों को तो रेखांकित किया ही है साथ ही साथ मुस्लिम वर्ग के प्रति एक वर्ग विशेष में फैली भ्रान्तियों का भी प्रस्तुत पुस्तक में शमन करने की कोशिश की गयी है।
प्रथम एवं द्वितीय खण्ड में पुस्तक को नौ उपशीषर्कों में विभाजित किया गया है जिसमें इस्लाम धर्म एवं मुसलमान: अवधारणा, स्वरूप एवं परम्परा, मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति, मुसलमान और आधुनिकता, साहित्य, कला, संस्कृति में मुसलमानों की दशा एवं दिशा, साम्प्रदायिकता एवं भारत, मुसलमान और स्त्री सम्बन्धी अवधारणा, कृतित्व के आइने में मुस्लिम समाज सुधारकों का योगदान, अल्पसंख्यक और भारतीय मुसलमान, इक्कीसवीं सदी में मुसलमान: चिन्तन के विविध आयाम के द्वारा मुसलमानों की उत्पत्ति एवं विकास प्रक्रिया को विस्तृत रूप से विवेचित एवं व्याख्यायित किया गया है। सम्पादकीय में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव का मानना है कि विश्व के अन्य धर्मों की अपेक्षा इस्लाम ने ईश्वर की एकता पर इतना अधिक जोर दिया कि अन्य किसी धर्म से इसका मुकाबला नहीं किया जा सकता। इस्लाम ने घोषणा की - ‘अल्लाह के अलावा और कोई अल्लाह नहीं है। ‘‘वह ईश्वर की एकता की प्रेरणा को इस हद तक ले गया कि उसने एक धर्म को छोड़कर, अन्य धर्मों को भी अस्वीकार कर दिया। जो विश्व के लिए एक आदर्श उपस्थित करता है। इस्लाम जीवन के सब पहलुओं की एकता पर जोर देने के लिए प्रसिद्ध है। यह राजनीति और धर्म, कारोबार और पूजा के बीच कोई भेद स्वीकार नहीं करता। पाक कुरान के शब्दों में ‘‘सारी सृष्टि ही इबादत की जगह है। अर्थात् इस दृष्टि से देखा जाये तो इस्लाम में मानवतावाद की अवधारणा स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है। साथ ही यह भी कुछ विद्वान लेखकों की राय की जो आरोप-प्रत्यारोप उन पर मुसलमानों पर लगते हैं उनका खण्डन जोरदारी से किया जाये। इस पुस्तक की मान्यता है कि और इस वर्ग के नौजवान पीढ़ी को शैक्षिक और सामाजिक उन्नति से परिपूर्ण करना होगा तभी अनेक रूकावटों के बावजूद इन जैसी अनेक समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। मैं आशा करती हूॅ कि प्रस्तुत पुस्तक न केवल शोधार्थियों एवं सामान्यजन के लिए उपयोगी बल्कि समाज एवं संस्कृति में रूचि रखने वाले अध्येयताओं के लिए भी खोजी दृष्टि पैदा करेगी।

समकालीन परिवेश: मुद्दे, विकल्प और सुझाव --डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

समकालीन ज्वलंत समस्याओं का अमर दस्तावेज -
डॉ0 ज्योति सिन्हा
पुस्तक - समकालीन परिवेश: मुद्दे, विकल्प और सुझाव
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक- नमन पब्लिकेशन्स, 4231/1अंसारी रोड , दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य रु. 450.00
पृष्ठ : 14+213=227
ISBN: 81.8129.235.9

वास्तव में देखा जाए तो किसी भी रचनाकार की रचनाएं, प्रकृति और जीवन से उसके सम्न्ध और संवाद का जीवंत साक्ष्य होती हैं। उस रचनाकार के व्यक्तित्व से जुड़ने का सबसे महत्वपूर्ण और पहला माध्यम भी ये रचनाएं ही होती हैं। इन्हीं के द्वारा हम उन तमाम भावों, अनुभूतियों, संवेदनाओं, विचारों, द्वन्द्वों, पूर्वाग्रहों, प्रतिबद्धताओं और आस्थाओं से रूबरू होते हैं, जो लेखकीय अभिव्यक्ति को एक विशेष दर्जा प्रदान करने के साथ उसे औरों से अलग करती हैं। किसी रचनाकार के व्यक्तित्व की यही विशेष तर्ज सृजन क्षेत्र में उसके मूल्यांकन का आधार बनती है। साहित्य एयं सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलाने वाले डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव उन रचनाकारों में से एक ऐसे ही रचनाकार हैं जो अपनी विशिष्ट पहचान के कारण जाने जाते हैं।
डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की नवीन पुस्तक समकालीन परिवेश: मुद्दे, विकल्प और सुझाव ,वर्तमान विश्व की ज्वलंत समस्याओं का मौलिक दस्तावेज है। जिसमें युवा विद्वान लेखक ने समकालीन समस्याओं का वैयक्तिक स्तर पर कुछ अपने विकल्प एवं सुझाव प्रस्तुत किये हैं। चाहे वह शिक्षा का गिरता स्तर हो या ग्लोबल आतंकवाद की समस्या, भ्रष्टाचार का वैश्विक प्रसार या ग्लोबल वार्मिंग, प्राकृतिक आपदाओं का आसन्न संकट, धार्मिक, भाषाई, जातीय असमानता, क्षेत्रीय असामंजस्य, महिलाओं के विरूद्ध हो रही घर की चौखट के साथ बाहरी हिंसा, बालश्रम, बाल अपराध एवं उनमें आने वाली समस्यायों तथा अधिकारों के लागू होने में प्रशासनिक दिक्कतें एवं पेचीदगियाँ, मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन, जन-हानि की समस्याओं को बड़े बेवाक तरीके से उठाने की कोशिश की है।
एक साहित्यकार में संवेदनशीलता और चिंतन दोनों का संयोग होना उसकी श्रेष्ठता की कसौटी माना जाता है। कभी-कभी इन दोनों में बड़ा असन्तुलन दिखाई पड़ता है। डॉ. वीरेन्द्र जी में इन दोनों का सन्तुलन होने के साथ-साथ आलोचनात्मक सजगता तथे रचनात्मक संवेदनशीलता भी देखी जा सकती है। मेरा अपना विचार है कि लेखन वही होता है जो कि लेखक स्वयं हुआ करता है। अगर लेखक सहज नहीं है अपने चिंतन में स्पष्ट नहीं है तो उसका लेखन भी उलझा हुआ होगा। डॉ. वीरेन्द्र अपने भीतर से जो महसूस करते हैं वही लिखते हैं इसलिए आपके लेखन में फ्राड बिल्कुल नहीं है क्योंकि मुझे ऐसा लेखन ही पसन्द है इसलिए एक लेखक के रूप में डॉ. वीरेन्द्र यादव को मैं स्वीकार करता हूँ। आपके सबसे अधिक लेख मुझे समकालीन समस्याओं से सम्बन्धित विषयों ने अधिक प्रभावित किया है।
डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से अपनी मानवीय चिन्ताओं को व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि वर्तमान में मानव जाति के समक्ष सबसे बड़ी समस्या सम्मानपूर्वक जीवन यापन की है। वैश्विक स्तर पर अनेक मानवीय असमानताओं के चलते पग-पग पर व्यक्ति आज व्यक्ति तिरस्कृत, असुरक्षित एवं उत्पीड़ित नजर आ रहा है। मानव का मानव के द्वारा जितने कहर इन दिनों ढाए जाने लगे हैं उतने शायद पहले कभी सुनने एवं देखने को नहीं मिलते हैं। इसके साथ ही लेखक का मानना है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के कारण हम सांस्कृतिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसा लगता है कि हमारी चाहरदीवारी व खिड़कियाँ खुली रखने की प्रक्रिया में हमारे घर की सारी हवा ही निकल गयी प्रतीत हो गयी है और बाहर की दूषित हवा अंदर भर गई है। यही नहीं सदाचार, सहिष्णुता, अनुशासन, मर्यादित भावना और कर्मनिष्ठा आदि के प्रति हमारा दृष्टिकोण बड़ी तेजी से बिखरता जा रहा है और ये सब यूटोपिया प्रतीत हो रहे हैं। भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद का काला साया चहुॅदिश अपने रक्त पिपाशु पंजों से उत्तरोत्तर आगे बढ़ता ही जा रहा है। संक्रमण काल की एक ऐसी वेला में मानव वर्तमान समय में इतिहास की उस रपटीली मोड़ पर आ खड़ा हो गया है, जहाँ पर स्थायित्व का खतरा हर स्तर पर बढ़ता ही जा रहा है। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव मनुष्य के समक्ष आने वाली इन समस्याओं को स्वयं मनुष्य को ही दोषी ठहराते हैं इसके साथ ही उपभोक्तावादी जीवन पद्धति के साथ अन्य समस्याएं, शासन एवं शक्ति रूपी विचारधारा की भी देन मानते हैं।
डॉ. वीरेन्द्र यादव के समीक्षात्मक लेख अधिकांशतः कृतिपरक हैं ।आपने प्रायः वस्तुनिष्ठ, पाठपरक विवेचन किया है। स्पष्ट है कि समीक्षक के रूप में डॉ. वीरेन्द्र यादव का अवदान महत्वपूर्ण है। सम्प्रति ऐसी ही समीक्षाएं कालक्रममें सत समीक्षा की मानक सिद्ध होती हैं। डॉ. वीरेन्द्र यादव की प्रस्तुत पुस्तक अपनी बेवाक टिप्पणियों एवं भाषा की दृष्टि से सारगर्भित है। कहीं-कहीं कुछ शब्दों के प्रयोग नई समस्याओं एवं विवादों को जन्म देते प्रतीत होते हैं। पुस्तक का शीर्षक जितना सार्वभौमिक हैं उतनी ही व्याख्याएं, विकल्प एवं सुझाव भी व्यवहारिक एवं सैद्धान्तिक तौर पर सर्वमान्य से लगते हैं। डॉ. वीरेन्द्र के सारगर्भित सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक लेख उनके गम्भीर चिंतक की छवि उभारते हैं। परन्तु आपके समग्र कृतित्व से परिचित लोग जानते हैं कि आप एक उच्चकोटि के संवेदनशील लेखक हैं क्योंकि आपके लेखन में वादों, सिद्धान्तों की अभिव्यक्ति नहीं, प्रत्युत समकालीन परिवेश के विविध विवर्तों की स्पष्ट अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। कुल मिलाकर डॉ. वीरेन्द्र की यह पुस्तक समसामयिक ज्वलंत घटनाओं को बहुत व्यापकता के साथ हमारे समक्ष रखती है और एक नई समझ तथा नई बहस को जन्म देती है यही इस पुस्तक की सफलता है और उपलब्धि भी।

इक्कीसवीं सदी का भारत - मुद्दे , विकल्प और नीतियाँ-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

इक्कीसवीं सदी का भारत - मुद्दे ,विकल्प और नीतियाँ
डॉ. परमात्मा शरण गुप्ता
पुस्तक - इक्कीसवीं सदी का भारत - मुद्दे , विकल्प और नीतियाँ
सम्पादक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन, 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य: रू.995 .00
पृष्ठ : 18+426=444
ISBN: 978.81.8455.204.1

प्रत्येक कालखण्ड अपने आपमें कुछ यक्षप्रश्न समेटकर हम सभी के सामने आता है। ऐसा ही कुछ 21वीं सदी के द्वारा भी हो रहा है। नई सदी का आगमन एक ओर हम सभी को रोमांचित कर रहा है वहीं दूसरी ओर एक प्रकार की असमंजस वाली स्थिति में भी खड़ा करता है। तमाम सारे मुद्दे, विषय, समस्याएँ 21वीं सदी के आगमन पर उसके स्वागत में खड़े मिले और इसके विकल्प को, नीतियों को, समाधान को तलाशन का दायित्व 21वीं सदी हमको सौंपती दिखती है। अपने इसी दायित्वबोध को पूर्णता का एहसास कराने के लिए डॉ वीरेन्द्र सिंह यादव प्रयासरत् दिखाई देते हैं और 21वीं सदी में प्रमुखता से सामने आते विषयों पर सम्पादित दृष्टिकोण को समग्रता प्रदान करते हैं।
‘इक्कीसवीं सदी का भारत - मुद्दे विकल्प और नीतियाँ’ जैसे दुरुह और विस्तृत विषय पर संयमित ढंग से सम्पादकीय कलम चलाते हुए डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने 69 लेखों का संग्रह कर प्रत्येक विषय को टटोलने का सराहनीय प्रयास किया है। 21वीं सदी की आधुनिक सोच के प्रति अपनी सोच को आधुनिकता का अमली जामा पहनाने के साथ ही विषय की गम्भाीरता को विस्मृत नहीं किया गया है। देश को केन्द्रबिन्दु मानकर और 21वीं सदी को एक परिस्थिति स्वीकार कर उसका समग्र चिन्तन पुस्तकाकार रूप में सामने आता है जो सतत विकास, भारतीय अर्थव्यवस्था और भूमण्डलीकरण, वैष्वीकरण, ग्रामीण विकास, कृशि के आध्ाुनिकीकरण की चर्चा कर राष्ट्र की औद्योगिक और आर्थिक नीति के प्रति सकारात्मक सोच का परिदृश्य स्पष्ट किया है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विविध बिन्दुओं की विकासपरक अवस्था के साथ ही समलैंगिकता, एड्स, वेष्यावृत्ति, साम्प्रदायिकता, सूखा, बालश्रम, कन्याभ्रूण हत्या, खाद्यान्न संकट जैसी शिक्षित एवं उननत समज की समस्याओं को शमिल कर उनके निदानात्मक स्वरूप को सहेजा है।
समीक्ष्य पुस्तक की विशेषता यह कही जायेगी कि विषयों का व्यापक विस्तार भी कहीं भटकाव की स्थिति पैदा नहीं करता है। राष्ट्रीय स्तर के विकासपरक और समस्यापरक मुद्दों पर सम्पादकीय दृष्टिकोण थोपा हुआ सा प्रतीत न होकर उनका विश्लेषणात्मक स्वरूप प्रदर्शित होता नजर आता है। यही कारण है कि यदि चुनौतयाँ सामने दिखतीं हैं तो 21वीं सदी में भी चुनौतियों का गाँधीवादी समाधान नजर आता है। भाशाई संकट, घरेलू हिंसा, नैतिक मूल्यों का हृास, सामाजिक परिवर्तन, भारतीय कला आदि विषय जो सीधे-सीधे आम आदमी से जुड़े होते हैं को भी सहेजने का सुखद प्रयास दिखाई देता है।
यह बात और है कि 21वीं सदी में समाज की बहुत सी वर्जनाओं को तोड़ डाला गया है; सामाजिक परिवर्तन के दौर ने पारिवारिक विघटन की स्थिति को पैदा कर दिया है; विकेन्द्रीकरण के चलते समग्रतावादी संरचनाएँ टूट रहीं हैं; विकास के समकालीन मॉडल के साथ विकृतियाँ भी अपना ‘रोल’ निभा रहीं हैं पर इस पुस्तक के आलेख और सम्पादकीय दृष्टि दर्शाती है कि यक्षप्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रत्येक कालखण्ड में एक युद्धिष्ठिर पैदा होता है। मुद्दे विकल्प और नीतियों के रूप में सामने दिखते प्रयासों के बाद यक्षप्रश्नों के लिए हम समीक्ष्य पुस्तक के सम्पादक डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव से युद्धिष्ठिर की भूमिका जैसी आशा तो कर ही सकते हैं।




बदलते परिदृश्य में नई सहस्त्राब्दी का भारत--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव



बदलते परिदृश्य में नई सहस्त्राब्दी का भारत
डॉ अजीत सिंह
पुस्तक - बदलते परिदृश्य में नई सहस्त्राब्दी का भारत
सम्पादक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन, 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 750-00
पृष्ठ : 18+398=416
ISBN: 81.86400.001.X

21वीं सदी का आगमन कई मायनों में अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। मानव-जीवन के विविध पक्षों पर, उसकी सोच पर, जीवन-शैली पर 21 वीं सदी का प्रभाव स्पष्ट रूप स देखा गया है। समाज का निर्माण व्यक्तियों की आपसी सामूहिकता और सह-सम्बन्ध से होता है। स्वाभाविक है कि व्यक्तियों के ऊपर होते प्रभावों और परिवर्तनों का असर समाज पर, देश पर भी होना था। ‘बदलते परिदृश्य में नई सहस्त्राब्दी का भारत’ कैसा होगा, उसके विचार-बिन्दु क्या होंगे, उसकी परिवर्तन यात्रा किन-किन पड़ावों से होकर गुजरेगी... आदि-आदि मुद्दों को डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने अपने सम्पादन में सभी के सामने रखा है।
21वीं सदी के भारत के बदलते स्वरूप को उन्होंने किसी एक बँधे-बँधाये अथवा विशेष विषय के आध्ाार पर रेखांकित नहीं किया है वरन् इसको एक प्रकार का विस्तार देते दिखे हैं। आतंकवाद, नक्सलवाद, मानवाध्ािकार, आपदा प्रबन्धन एवं ग्लोबल वॉर्मिंग, आन्तरिक सुरक्षा जैसे राष्ट्रीय समस्यागत मुद्दों को आधार बनाकर प्रस्तुत किया है तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पंचायती राजव्यवस्था, संचार माध्यम जैसी विकासपरक स्थितियों को भी सामने रखा है। इन विषयों और ज्वलन्त बिन्दुओं के अतिरिक्त डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव साहित्य, संगीत, स्त्री-चिन्तन, पारिवारिक विघटन जैसे बिन्दुओं पर अपनी पैनी सम्पादकीय दृष्टि बिखेरते दिखते हैं।
कुल 73 लेखों के विशाल संग्रह की शुरुआत जीवन के लिए महत्वपूर्ण स्वीकारे गये चिकित्सा क्षेत्र से करते हुए पुस्तक का समापन संचार माध्यमों की कल्याणकारी योजनाओं पर होता है। यह गहन सम्पादकीय दृष्टि का ही परिचायक है कि लेख चयन के अतिरिक्त उनक संयोजन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। चिकित्सा विज्ञान का परिवर्तित स्वरूप और इसमें संगीत तथा मंत्र विज्ञान की सार्थकता को सिद्ध करती स्थितियों का समावेश है तो मानव की जीवन-शैली में लोक साहित्य, मंत्रों एवं वैदिक सूत्रों की महत्ता की सारगर्भित जानकारी है। 21वीं सदी की आधुनिक स्थिति में भी लोक की स्वीकार्यता, वैदिक संस्कृति की महत्ता भारतीय संस्कृति के उच्चीकृत होने के संकेत हैं।
साहित्य के द्वारा डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने शिक्षा को, स्त्री-चिन्तन को सहेजा है। वे उच्च शिक्षा में नीति की गुणवत्ता का प्रश्न खड़ा करते हुए इसके मुद्दे और विकल्पों को तलाशते दिखते हैं। शिक्षा क्षेत्र में समस्याएँ 21वीं सदी की सबसे बड़ी समस्या है, इससे निपटने के लिए सरकारी तन्त्र क्रियाशील है तो गैर-सरकारी तन्त्र भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। इसी विषय के आधार पर नैतिक मूल्यों के अध्ययन, शिक्षा में मानवाध्ािकार, यौन शिक्षा की आवश्यकता आदि पर भी महत्वपूर्ण विचारों का संकलन कर इनकी उपादेयता को सिद्ध करने का प्रयास किया गया दिखता है।
21वीं सदी मात्र आधुनिकता, स्वच्छन्दता, भौतिकवाद, उच्छृंखलता आदि से भरी हुई ही नहीं है। इस कालखण्ड में भी भारतीस संस्कृति का पोषण-संवर्द्धन लगातार किया जा रहा है। बुन्देली लोक-साहित्य, लोक-कला, लोक-गीत, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति की प्रासंगिकता आदि जैसे विषयों का संकलन सम्पादक की उस विस्तृत और सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाता है जो आधुनिकता का विस्तार देखता तथा सहेजता है तो लोक की सूक्ष्मता को भी अंगीकार करता है। विस्तृत सोच के साथ लघु का समावेश और संरक्षण इस पुस्तक की विशालतम उपलब्धि है जिसे कम से कम सहेजा तो जा ही सकता है।









इक्कीसवीं सदी का दलित आन्दोलन: साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकार--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

दलित आन्दोलन के कुछ अहम सवाल
डॉ ममता आनन्द
पुस्तक - इक्कीसवीं सदी का दलित आन्दोलन: साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकार
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन्स 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 550.00
पेज - 24 + 285 = 309
ISBN - 81-7487-658-8-4

रचनाकार अपने समय, समाज व परिस्थितियों से प्रभावित अवश्य होता है, पर इसके बावजूद भी उसे अपने व्यक्तित्व व नैतिक मूल्यों को बचाकर रखना पड़ता है पर कभी कभी यह भी देखने में आता हैकि लेखक को दुनिया की सारी सच्चाई उधेड़कर समाज के सामने पूरी निडरता से रखनी पड़ती है। तभी उसके लेखक होने की अस्मिता बोध की अभिव्यक्ति होती है। इस दृष्टि से डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव के कुशल सम्पादन में सम्पादित पुस्तक इक्कीसवीं सदी का दलित आन्दोलन साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकार में देश के छियालीस विद्वानों ने इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वाणी प्रदान की गई है। प्रस्तुत पुस्तक को दो खण्डों में विभाजित किया गया है। प्रथम खण्ड में दलित आन्दोलन के साहित्यिक सरोकारों से सम्बन्धित आलेखों को रखा गया है और द्वितीय खण्ड में दलित आन्दोलन के सामाजिक सरोकारों की व्याख्या की गयी है।
प्रथम खण्ड में दलित आन्दोलन विशेषकर साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में उसकी सीमाओं तथा परम्परागत साहित्य के समीक्षकों द्वारा लगाये गये विमर्शीय तिलिस्मों का फर्दाफाश किया गया है। विभिन्न लोक संस्कृतियों एवं विधाओं में चर्चित दलित आन्दोलन की विकास प्रक्रिया को इस खण्ड के द्वारा विद्वान प्राध्यापकों ने दलित -चिंतन एवं चेतना को व्याख्यायित किया है।
दलित आन्दोलन के सामाजिक सरोकार नामक इस खण्ड में दलित आन्दोलन के बढ़ते क्षितिजों को राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया गया है। सम्पादक की यह उद्घोषणा की आज दलित समाज से जुड़े लोग देश-विदेश के हर क्षेत्र में ऊँचे पदों पर आसीन हो गये हैं और अपने निश्चित क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। लेकिन सरकारों की (विशेषकर राज्यों की) भेदभावपूर्ण नीतियों (आर्थिक) के कारण जो लाभ एवं प्रोन्नति दलित समाज को मिलनी चाहिए वह उन्हें नहीं मिल पा रही हैं। यह चिंता एवं चिंतन का विषय है।
प्रस्तुत पुस्तक में विचार एवं स्वतंत्र अभिव्यक्ति की दृष्टि से सभी शोध आलेख अपनी विशेष छाप छोड़ते हैं। यह पुस्तक दलित चिंतन एवं परम्परा पर शोध कररहे उन सभी छात्रों एवं प्राध्यापकों के लिए उपयोगी तो होगी ही साथ ही सुधी पाठकों के लिए भी महत्वपूर्ण होगी जो सामान्यजन अर्थात हाशिए पर कर दिए गये लोगों की चिन्ता करते हैं।

नई सहस्त्राब्दी का दलित आन्दोलन मिथक एवं यथार्थ-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

दलित आन्दोलन के मिथक एवं यथार्थ
डॉ आशा वर्मा
पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी का दलित आन्दोलन मिथक एवं यथार्थ
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 495.00
पेज - 22 + 530 = 552
ISBN - 978-81-8455-251-5

दलित आन्दोलन समकालीन साहित्य में एक ज्वलंत मुद्दे के रूप में चर्चित आन्दोलन माना जा रहा है। जो अभी विमर्श का केन्द्र बना हुआ है। समय-समय पर समसामयिक विषयों को चर्चा में लाने वाले मार्क्सवादी समीक्षक डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव चर्चित मुद्दों एवं हाशिए पर कर दिए लोगों के प्रति अपनी पैनी सोच-समझ रखने के कायल माने जाते हैं। उनके अपने जीवन के कटु अनुभव एवं एहसास उनकी सृजित एवं सम्पादित की गई पुस्तकों में सदैव देखने को मिलते रहते हैं। इसी तरह का एहसास उनकी सद्यः प्रकाशित कृति नई सहस्त्राब्दी का दलित आन्दोलन: मिथक एवं यथार्थ नामक पुस्तक में देखने को मिलता है। दलित जीवन की समस्याओं एवं प्रगति के लिए प्रबुद्ध देशवासियों के विचारों को आमंत्रित करती इस पुस्तक में भारतीय दलित समाज की दशा, दिशा एवं इनके भावी नियोजन पर प्रकाश डाल गया है। इन्साइक्लोपीडिया के रूप में दस खण्डों में विभाजित - दलित आन्दोलन की पृष्ठभूमि: जाति की अवधारणा एवं सामाजिक प्रक्रिया, दलित एवं भूमण्डलीकरण का मनोविज्ञान, क्रान्ति के आइने में दलित चेतना, दलित आन्दोलन में अग्रज एवं अनुज कर्णधारों का योगदान, दलित आन्दोलन के विकास में संवैधानिक प्रयासों का विश्लेषण, दलित आन्दोलन में आधी दुनिया की अनुगूंज, दलित आन्दोलन के साहित्यिक सरोकार, दलित आन्दोलन के समाजशास्त्रीय, राजनैतिक एवं आर्थिक संदर्भ, दलित उत्पीड़न के समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक संदर्भ, दलित आन्दोलन के विविध संदर्भ आदि को रखा गया है। अपने सम्पादकीय में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने कुछ नये प्रश्नों को उठाकर दलित आन्दोलन के विमर्श में एक नई बहस को जन्म दिया है - सम्प्रति भारतीय राजकाज और समाज पर भारत के समक्ष दो दृष्टिकोण स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं - एक तथ्य संयुक्त राष्ट्र का है, इसने दलितों की स्थिति का निर्मम पोस्टर्माटम किया है। दूसरी दृष्टिकोण भारत सरकार द्वारा गठित आयोगों एवं कमेटियों का (सच्चर एवं रंगनाथ मिश्र कमेटी) है। इनमें भेदभाव के अलावा कुछ नजर नहीं आता है लेकिन एक अलग तरह का जो दृष्टिकोण देखने को मिलता है वह अति चौकाऊ किस्म का प्रतीक होता है वह यह कि हमारा राजनीति दलतंत्र दलितों, गरीबों के पक्ष में कोई ठोस जन अभियान क्यों नहीं चलाता ? दलतंत्र बाजारवादी हिंसा के खिलाफ क्यों नहीं खड़ा होता ? जातिवादी राजनीति प्रायश्चित क्यों नहीं करती ? राष्ट्रवादी राजनीति ही परम वैभवशाली राष्ट्र के लिए आक्रामक युद्ध क्यों नहीं करती। अपने ही करोड़ों भूखे लोगों की व्यथा यह राष्ट्र क्यों बर्दाश्त करता रहता है ? कितने भी बड़े पद पर पहुँचने पर हमारी पहचान जाति के रूप में ही क्यों की जाती है ? आदि ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तरों से रूबरू प्रस्तुत पुस्तक आने वाले समय में समाज एवं राष्ट्र को इस तर शिदृत के साथ चिंतन एवं मनन को जन्म देगी ऐसा मेरा विश्वास है।

दलित विमर्श के विविध आयाम-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

बहुजन एवं हाशिए पर कर दिए लोगों का खण्ड
दलित विमर्श के विविध आयाम
डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव
पुस्तक : दलित विमर्श के विविध आयाम
लेखक : डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक: निर्मल पब्लिकेशन्स, ।.139 गली नं 3, कबीर नगर शाहदरा, दिल्ली.54
मूल्य: रू. 250.00
पृष्ठ : 14+175=189
ISBN 81.86400.001.X

सामाजिक परिवर्तनों की छाप साहित्य में स्पष्ट रूप से सदा दृष्टिगोचर होती रही है या साहित्य में चर्चा के बाद उस विषय में परिवर्तन होते रहे हैं, यह विवाद का विषय हो सकता है। लेकिन वर्तमान में दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श इन्हीं दो धु्रवों के मध्य अपनी उपस्थिति को सिद्ध कर रहे हैं। साहित्य में इन दो विमर्शों की चर्चा आज पूरी तीव्रता से हो रही है। इसी विमर्श को डॉ. वीरेन्द्र ने बड़े ही तार्किक ढंग से ऐतिहासिक और वर्तमान के साथ सामंजस्य बनाकर प्रकट किया है।
दलित शब्द की उत्पत्ति से प्रारम्भ डॉ. वीरेन्द्र का दलित अवधारणाओं एवं समकालीन साहित्य को अपने में समाहित कर अतीत से आकर वर्तमान में कुछ यक्ष प्रश्नों के साथ आ ठहरता है। डॉ. वीरेन्द्र यादव की इस कृति को मूलतः चार भागों में विभक्त करके देखा जा सकता है। पहले भाग में वे दलित शब्द की पड़ताल करते हैं वहीं शेष तीन भागों में वे दलित आन्दोलन के सूत्रधारों का अलग-अलग विश्लेषण एवं चित्रण करते हैं। छत्रपति शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले, पेरियार, स्वामी अछूतानन्द को दलित आन्दोलन का महान प्रणेता बताकर उनके कुछ अनछुए पहलुओं को पुस्तक सामने रखती है।
दलित आन्दोलन के आधार-स्तम्भ के रूप में लेखक डॉ। भीमराव अम्बेडकर की चारित्रिक विशेषताओं, उनके संघर्षों तथा उनकी समाज के प्रति सकारात्मक सोच को स्थापित करते हैं वहीं डॉ. अम्बेडकर की सोच एवं संघर्ष के सापेक्ष महात्मा गाँधी के दलितोत्थान का भी सूक्ष्मता से पड़ताल करते हैं। यह विवादों को जन्म देता प्रतीत होता है किन्तु विविध् तथ्यपरक संदर्भ इन विवादों पर लगाम लगाते दिखते हैं।
बाबू जगजीवन राम, मान्यवर कांशीराम और आयरन लेडी मायावती के संघर्षों, राजनैतिक, सामाजिक विकास के द्वारा लेखक दलित आन्दोलन की नयी दिशा को समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं। इन दलित पुरोधाओं के व्यक्ति जीवन एवं दलित समाज के लिए किये गये इनके कार्यों से एक प्रकार का जो संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जिसे आजाद भारत में पुनः एक दूसरी आजादी का संघर्ष कहा जा सकता है। लेखक का मानना है कि यह एक ऐसा संघर्ष है जो अपने देश में दलित जनों के द्वारा किया जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में दलित विमर्श भले ही अपने अवधारणात्मक विकास की प्रक्रिया में हो किन्तु यह तो स्पष्ट है कि अपनी अस्मिता के लिए दलित आन्दोलन के प्रणेताओं ने जो रास्ता बनाया है निश्चित ही वह रास्ता सकारात्मक मंजिल की ओर जाता दिखता है।
इन्हीं सबके बीच डॉ। वीरेन्द्र दलितों के विकास, उनके व्यापार, उनकी शिक्षा, उनके आर्थिक स्तर, उन्हें मिलती सुविधाओं, उनकी कानूनी-संवैधानिक स्थिति आदि को लेकर शिद्दत के साथ प्रश्न भी खड़े करते हैं। कागजों पर चल रही तमाम सारी सुविधाओं के परिप्रेक्ष्य में लेखक के ये प्रश्न यक्ष प्रश्न लगते हैं। इन प्रश्नों का समाधन होगा या नहीं, पता नहीं पर डॉ. वीरेन्द्र की समीक्ष्य कृति दलित आन्दोलन को एक नयी दिशा, नया दृष्टिकोण अवश्य ही प्रदान करने में सफल हो सुधि-पाठकों, शोधार्थियों एवं प्राध्यापकों की दृष्टि में प्रस्तुत पुस्तक अपना स्थान अवश्य बनाएगी।

इक्कीसवीं सदी का महिला सशक्तिकरण: मिथक एवं यथार्थ--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

इक्कीसवीं सदी का महिला सशक्तिकरण: मिथक एवं यथार्थ
डॉ.अलका द्विवेदी
पुस्तक - इक्कीसवीं सदी का महिला सशक्तिकरण: मिथक एवं यथार्थ
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 700.00
पेज - 16 + 306 = 322
ISBN - 979-81-8455-205-8

किसी भी कृति को पढ़ने के मूल में कई प्रकार की जिज्ञासाएं होती हैं आवश्यक नहीं कि हर पाठक की जिज्ञासाएं एक ही प्रकार की हों। हमारा ध्यान यहाँ उस अंश में जाता है जिसमें उस पहलू के प्रस्थान बिन्दु की चर्चा की गई हो जिसमें अभी तक किसी का ध्यान न गया हो। इस दृष्टि से डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा सम्पादित पुस्तक इक्कीसवीं सदी का महिला सशक्तिकरण: मिथक एवं यथार्थ की चर्चा की जाए तो वह टिप्पणी सटीक नजर आती है। प्रस्तुत पुस्तक में स्त्री विमर्श बनाम मातृसत्ता तथा पितृसत्ता बनाम मातृसत्ता की चर्चा कर नारी मुक्ति आन्दोलन को एक नया विमर्श दिया गया है। वैसे देखा जाये तो महिला सशक्तिकरण की अवधारणा लगभग सभी समाजों में प्रारम्भ से रही है लेकिन एक विचारधारा के रूप में देखा जाना तथा जनसाधारण में इसका जनान्दोलन के रूप में विस्तार नया है। स्वाभाविक है कि वर्तमान में महिला सशक्तिकरण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक महत्व का विषय एवं प्रश्न बन गया है।
प्रस्तुत पुस्तक में देश के अट्ठावन विद्वानों के शोधपरक लेखों को रखा गया है जिसमें महिला सशक्तिकरण एवं समाज में इसके प्रति मिथक एवं यथार्थ के विविध पहलुओं पर गम्भीरता से प्रकाश डाला गया है। प्राचीन काल से विशेषकर वेदों से लेकर वर्तमान में संसद भवन की सीढ़ियों के साथ ही विज्ञान, कला, संस्कृति, दर्शन की दुनिया से लेकर आकाश-पाताल को एक करती आधी दुनिया की अनुगूंज तो इसमें मिलती ही है साथ ही भूमण्डलीकरण एवं उदारीकरण के इस युग में जहाँ नारी ने स्वतंत्रता रूपी अनेक हक प्राप्त कर लिए हैं फिर भी एक दीवार पितृसत्तात्मक समाज उसके ऊपर डाले रहता है जिसके परिणामस्वरूप यह अनेक समाजों में आज भी हिंसा एवं अन्य अत्याचारों को सहती है। इसका कारण पारम्परिक मूल्यों में गिरावट समाज में बढ़ रही है अपराधिक प्रवृत्तियाँ, कानूनी प्रावधानों का कमजोर क्रियान्वयन, दृश्य एवं श्रव्य इलेक्ट्रानिक माध्यमों में हिंसा के अतिरंजित चित्रण इत्यादि ने महिला उत्पीड़न में अपना योगदान दिया है। पुस्तक के कुछ विद्वानों लेखकों का मानना है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार द्वारा महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई गयी एवं शिक्षा से सम्बन्धित अनेक सुविधाओं तथा कानूनी प्रावधान बनने के बावजूद यह भी सच है कि सामाजिक स्तर पर राजनीतिक जागरूकता, प्रतिभागिता एवं आर्थिक स्वावलम्बन के क्षेत्र में जिस अनुपात में उन्हें अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए थी उतनी वर्तमान में सम्भव नहीं हो पायी है। प्रस्तुत पुस्तक महिलाओं के उत्थान एवं पतन के श्याम एवं श्वेत पक्षों का ईमानदारी से विवेचन एवं विश्लेषण करती नजर आती है।





नई सहस्त्राब्दी का महिला सशक्तिकरण अवधारणा, चिन्तन एवं सरोकार--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

नई सहस्त्राब्दी का महिला सशक्तिकरण अवधारणा, चिन्तन एवं सरोकार
अन्जू दुआ जैमिनी
पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी का महिला सशक्तिकरण अवधारणा, चिन्तन एवं सरोकार
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 2100.00(तीन भागों में )
पेज - 52 + 348 + 52+360+52+355=1219
ISBN - 978-81-8455-250-8

लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त हैं। यह एक सैद्धान्तिक बात है परन्तु व्यवहारिक जीवन में यह कितना प्रयुक्त हो रहा है यह जनसामान्य के बीच जाकर सहज रूप से देखा एवं परखा जा सकता है। मेरी समझ से प्रजातंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसमें आम आदमी की समान भागीदारी सुनिश्चित न हो। सीमित प्रजातांत्रिक शक्ति क्रांति एवं अव्यवस्था को जन्म देता है इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि (विशेष रूप से आधी दुनिया की आबादी को लेकर) कि प्रजातंत्र में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आमजन को उनके अधिकारों, कर्तव्यों तथा उनकी शक्ति के बारे में अवगत कराया जाये। इन सब गम्भीर प्रश्नों को शिद्दत के साथ उठाने का प्रयास बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, प्रतिभा, सम्पन्न, भाषाविद् युवा साहित्यकार, लेखक, सम्पादक एवं समकालीन समस्याओं के मर्मज्ञ विज्ञान डॉ। वीरेन्द्र सिंह यादव को साहित्यकार जितने भी विशेषण दें वह कम ही हैं। आपके द्वारा सम्पादित तीन खण्डों में भारी-भरकम ग्रन्थ रूपी पुस्तक नई सहस्त्राब्दी का महिला सशक्तिकरण, अवधारणा, चिन्तन एवं सरोकार के माध्यम से आपने देश के विद्वानों से विचार आमंत्रित कर आधी दुनिया का स्याह यथार्थ व्यक्त किया है। प्रथम, द्वितीय, तृतीय खण्डों में सम्पादित इस ग्रन्थ में महिला सशक्तिकरण के विविध प्रतिरूपों को कई उपशीर्षकों में विभक्त किया गया है। उनमें प्रमुख इस प्रकार हैं - महिला सशक्तिकरण-मिथक एवं यथार्थ, महिला उत्पीड़न के समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक आयाम, महिला सशक्तिकरण और दलित महिलाएं, महिला सशक्तिकरण एवं पंचायती राज व्यवस्था, राजनीति में महिलाओं की भागीदारी, स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं का योगदान, महिला सशक्तिकरण, आज, कल और आज, महिला सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका, स्त्री विमर्श के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सरोकार, महिला सशक्तिकरण और महात्मा गाँधी, आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तिकरण, कन्याभ्रूण हत्या का मनोविज्ञान, भूमण्डलीकरण के दौर में नारी, महिला सशक्तिकरण और सरकारी प्रयास आदि विषय महिलाओं की विकास एवं सफलता की कहानी तो बतलाते ही हैं साथ ही कई प्रश्न ऐसे अनुत्तरित भी छोड़े गये हैं जिनका सभ्य समाज से उत्तर भी मांगा गया है। पुस्तक की अवधारणा है कि प्रत्येक समाज अपने पूर्ववर्ती समाज को देखते हुए ही अपनी परम्पराएँ बनाता एवं बिगाड़ता है। केवल भारतीय समाज ही नहीं, बल्कि विश्व की किसी भी जाति, सम्प्रदाय वर्ग का समाज प्राकृतिक रूप से पुरुष सत्तात्मक, समाज (कुछ अपवादों को छोड़कर) रहा है और वर्तमान में भी हैं। यदि ऐसा न होता तो पाश्चात्य देशों में अनेक स्त्री लेखिकाओं/समाज से विभागों को नारीवादी की संज्ञा न दी गई होती और उन्हें पुरुषों द्वारा बनायी गयी अनेक परम्पराएं न तोड़नी पड़ती। उदाहरण के रूप में सेकेण्ड सेक्स की विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द वोऊवार जिन्हें 20वीं सदी में नारी मुक्ति आन्दोलन की क्या आवश्यकता थी ? संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की वर्जीनिया कामन वेल्थ विश्वविद्यालय में दर्शन एवं धार्मिक अध्ययन विभाग में इस्लामी अध्ययन की प्रोफेसर डॉ. अमीना वदूद को कुरान एण्ड बुमेन री रीडिंग, द सीक्रेट टेक्स्ट फ्राम वुमेन प्रास्पेक्टिव नामक किताब लिखकर कुरान की रोशनी में मुस्लिम औरतों के अहम की जोरदार वकालत करने की क्या आवश्यकता है ? इसके साथ ही लज्जा, द्विखण्डित आदि सैकड़ों पुस्तकों की बंगला देशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को निर्वासित करने की क्या आवश्यकता है ? इस सम्पादित पुस्तक में सैकड़ों ऐसी महिलाओं के उदाहरण भरे पड़े हैं जो स्त्री मुक्ति आन्दोलन के लिए आज भी प्रतिबद्ध है। हमें आशा है कि प्रस्तुत सम्पादित पुस्तक आधी आबादी के स्याह यथार्थ से तो रूबरू कराती ही है इसके साथ ही नई सहस्त्राब्दी के प्रथम-दशक की समाप्ति तक के दौर की सफलता एवं भविष्य की कहानी भी कहती नजर आती है। इस दृष्टि से यह पुस्तक जनसामान्य के पाठकों के लिए तो हितकर होगी ही। साथ ही आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श का रूप भी स्थापित करेगी। ऐसी मैं व्यक्तिगत मानती हूँ ।




मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

नई सहस्त्राब्दी का आतंकवाद: संघर्ष के बदलते प्रतिमान--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

नई सहस्त्राब्दी में आतंकवाद के विविध स्वरूप
डॉ.उत्तरा यादव
पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी का आतंकवाद: संघर्ष के बदलते प्रतिमान
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 895.00
ISBN - 978-81-8455-255-3

डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव एक अच्छे अध्येता एवं शोधकर्ता के साथ-साथ एक परिपक्व लेखक हैं। समकालीन समस्याओं के उद्भट विद्वान के सृजन में मौलिकता एवं सारगर्भिता एक साथ देखने को मिलती है। उनके द्वारा सम्पादित सद्यः प्रकाशित पुस्तक नई सहस्त्राब्दी का आतंकवाद: संघर्ष के बदलते प्रतिमान में आपने अपने सम्पादकत्व में ऐसे अनेक तत्वों का पर्दाफाश किया जिन्हें पढ़कर किसी भी जागरूक व्यक्ति के होश उड़ सकते हैं - पुस्तक की मान्यता है कि भारत दुनिया का अकेला देश नहीं है जो आतंकवादी हमलों से ग्रस्त एवं त्रस्त है वरन् विश्व समेत एशिया आदि देशों में शान्ति शब्द का लोप सा हो गया है। भारत में आये दिन आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। भारत में एक के बाद होने वाले बम धमाकों से दहशत का माहौल है। अर्थात् वे सर्वत्र हैं, किन्तु महाराष्ट्र में वे सबसे प्रखर है। वे अक्सर रचनाधर्मी लोगों, फिल्म स्टारों अथवा लेखकों, कलाकारों को इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि ऐसा करने से लोगों का ध्यान उनकी ओर जाता है ........ महाराष्ट्र में वे खुद को एक सेना विशेष की संज्ञा देते हैं तो उड़ीसा में भक्त के रूप में प्रचार प्रसार कर लोगों को मारते हैं। वहीं उत्तर-पूर्व में भाषायी समस्या के रूप में हमारा उत्पीड़न करते हैं तो उत्तर प्रदेश में नक्सली के रूप में हमारे समक्ष आते हैं ......... वास्तविकता यह है कि हमें आज उनके मजहब से भ्रमित नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे समाज के लिए एक अभिशाप हैं। उनका मजबूत पक्ष यह है कि वे सरकारों से सांठगांठ कर कारगुजारी करते रहते हैं। शायद उन्हें यह दिखता है कि समाज उनसे टकराने की स्थिति में नहीं है। इन्हीं सब समस्याओं की पड़ताल करती प्रस्तुत पुस्तक में सात खण्डों के द्वारा पैंतालीस विद्वानों ने अपने विचार रखे हैं। प्रथम खण्ड में आतंकवाद का स्वरूप एवं प्रक्रिया, द्वितीय के तहत आतंकवाद के कारक, कारण और निवारण, तृतीय खण्ड में आतंकवाद के विनाशकारी खतरे, विशेषकर जम्मू कश्मीर राज्य के संदर्भ में, चतुर्थ खण्ड में भारतीय परिदृश्य में आतंकवाद की चुनौतियाँ, पाँचवें खण्ड में बदलते परिदृश्य में वैश्विक आतंकवाद, छठें भाग में आतंकवाद के समाधान में अग्रज एवं अनुज पीढ़ी के योगदान एवं सातवें खण्ड के द्वारा नई सहस्त्राब्दी में आतंकवाद के विविध मुखौटों के जिनमें साइबर आतंकवाद एवं जैविक आतंकवाद को रेखांकित किया गया है; जिसका शीघ्र अन्त होता नजर नहीं आ रहा है। कुल मिलाकर आतंकवाद के प्रमुख कारण क्या है और इसके भावी समाधान क्या हो सकते हैं। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से इस पर गम्भीर चर्चा करने की कुशल सम्पादक डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने कोशिश की है। मैं ऐसी मानती हूॅ कि प्रस्तुत पुस्तक इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद पर ब्रेक लगाती नजर आती है।










नई सहस्त्राब्दी में मानवाधिकार के विविध सन्दर्भ--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

मानवाधिकार के बहाने एक नई सीख
डॉ. अजय सिंह
पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी में मानवाधिकार के विविध सन्दर्भ
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 795.00
पेज - 24 + 304 = 328
ISBN - 978-81-8455-257-7

समसामयिक समस्याओं एवं वैश्विक स्तर पर घटित होने वाली घटनाओं पर अपनी पैनी दृष्टि रखने वाले आलोचक डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने अपने लेखन में आम-आदमी की चिंता एवं सरोकारों को गम्भीरता से उकेरा है।
इसमें कोई शक नहीं कि आज भारत सहित विश्व प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति के नित नूतन शिखरों को चूम रहा है। उपभोक्तावादी संस्कृति एवं विभिन्न व्यवसायिकता की संस्कृति चारों ओर फैल रही है जो विकास एवं आधुनिकता की नई परिभाषाएं बनाती जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर भारतीय एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने पर विभिन्न समस्याएं दृष्टिगोचर हो रही हैं। जिनमें प्रमुख रूप से नस्लीय भेदभाव, धार्मिक अधिकार, भाषाई अधिकार, लिंगभेद, पुलिस अत्याचार आदि। इन सबके कारण संवैधानिक मान-मर्यादा का हनन हो रहा है और संविधान में प्रदत्त मानव अधिकारों का उल्लंघन एवं हनन हो रहा है। वर्तमान में वैसे मानव अधिकार की अवमानना से सम्बन्धित अनेक घटनाएं घट रही है लेकिन भारत में इसकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में दलितों पर अत्याचार, बड़ी परियोजनाओं के कारण लोगों का विस्थापन, प्राकृतिक आपदाओं के कारण उसके पुनः बसाने की समस्याएं। बच्चों के साथ अमानवीय बर्ताव कराने सम्बन्धी कमी की समस्याएं ,जिसमें वैश्यावृत्ति के उकसाने की समस्याएं आज केन्द्र में हैं। कई राज्यों में भाषायी समस्या के कारण क्षेत्रीय हिंसा, कई राज्यों में आतंकवादी गतिविधियां, जेल में बलात्कार तथा पुलिस उत्पीड़न, महिला हिंसा, बंधुआ मजदूरी, अल्पसंख्यकों के प्रति किया जाने वाला उत्पीड़न ,अत्याचार एवं धार्मिक असहिष्णुता के गम्भीर प्रश्न जुड़े हुए है। इन्हीं सब चिंताओं एवं चिंतन को समेटे हुए डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की प्रस्तुत देश के विभिन्न प्रान्तों से सम्बद्ध तैंतीस विद्वानों के विचारों से सम्बद्ध अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती नजर आती है। मानवाधिकारों की विशद विवेचना प्रस्तुत करती इस पुस्तक को सम्पादक ने चार खण्डों में विभाजित किया है जिसमें प्रथम के तहत मानवाधिकार की अवधारणा एवम् विकास प्रक्रिया के तहत इसका मूल्यांकन किया गया है। दूसरे खण्ड के रूप में मानवाधिकारों की अवधारणा को महिलाओं के विशेष सन्दर्भ में रखकर महिला सशक्तिकरण की वास्तविकता एवं महिला शोषण ए वं भ्रूण हत्या के रूप में हो रहे अधिकारों के हनन की विवेचना की गई है। तीसरा खण्ड मानवाधिकार के तहत इसके चिन्तन एवं चुनौतियों और समाधान के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में व्याखायित किया गया है जिसमें मानवीय सुरक्षा के लिए मानवाधिकारों में संरक्षण की बात शिद्दत के साथ की गयी है। अन्तिम चौथे खण्ड के रूप में नई सहस्त्राब्दी में मानवाधिकार के अन्तर्गत सूचना के अधिकार से लेकर विविध शास्त्रों में इसके संरक्षण एवं विकास की पड़ताल की गयी है। इस दृष्टि से देखा जाये तो प्रथम दृष्टया प्रस्तुत पुस्तक मानवाधिकारों को प्रोत्साहित एवं संरक्षण की दिशा में अपनी विशेष पहचान बनाती हैं।

नई सहस्त्राब्दी का पर्यावरण, चिन्तन, चुनौतियाँ और समाधान--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

नई सहस्त्राब्दी का पर्यावरण चिन्तन
डॉ.पुनीत बिसारिया
पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी का पर्यावरण, चिन्तन, चुनौतियाँ और समाधान
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 1990.00 (दो भागों में)
पेज - 22 + 452 + 22 + 454 = 950
ISBN - 978-81-8455-238-8

कहते हैं कि सृजनात्मकता एक नैसर्गिक ऊर्जा है। इसका सम्बन्ध प्रकृति से होता है। पुराण एवं इतिहास इस तथ्य के साक्ष्य देते हैं कि मानव और प्रकृति आदिकाल से एक दूसरे से आन्योन्याश्रित रूप से सम्बद्ध रहे हैं। इन्हीं स्थितियों में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पैदा तो एक विशेष परिवेश में होते है लेकिन अपनी लगन, कर्मठता एवं विचार शक्ति के माध्यम से वैयक्तिक से निर्वैयक्तिकता की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसी स्वतंत्र चिन्तन की सोच को आपने जीवन में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने लागू किया है।
पर्यावरण समस्या को समय-समय पर अपने शोधपरक दृष्टि में विवेचित एवं विश्लेषित करने वाले डॉ. यादव ने इसके संरक्षण एवं जागरूकता को लेकर कई पुस्तकों की रचना की है। अगली कड़ी के रूप में सद्यः सम्पादित दो खण्डों में नई सहस्त्राब्दी का पर्यावरण: चिन्तन, चुनौतियाँ एवं समाधान का प्रकाशन किया है। प्रथम खण्ड में नौ उपशीषर्कों के अन्तर्गत विभाजित एवं द्वितीय खण्ड में बारह उपशीषर्कों में विभाजित पुस्तक में पर्यावरण समस्या को गम्भीरता के साथ विवेचित एवं विश्लेषित किया गया है। प्रमुख उपशीर्षक-पर्यावरण की अवधारणा एवं प्रदूषण के विविध आयाम 21वीं शताब्दी की गम्भीर पर्यावरणीय चुनौती ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण शिक्षा एवं जागरूकता, जल प्रदूषण एवं संरक्षण के विविध स्वरूप, औद्योगिक विकास के परिप्रेक्ष्य में पर्यावरणीय संकट एवं संरक्षण, पर्यावरण प्रबन्धन, संरक्षण एवं नीतियां, बाँध परियोजनाएँ एवं पर्यावरण प्रबन्धन जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण प्रदूषण के विविध संदर्भ, विविध आयामों में पर्यावरण प्रदूषण का स्वरूप, संरक्षण और जागरूकता, साहित्य में पर्यावरण के विविध सन्दर्भ एवं प्रदूषण निवारण के समाधान, पर्यावरण और भारतीय अरण्य संस्कृति, जैव विविधता के विविध सन्दर्भ तथा उसका संरक्षण आदि विमर्शों को छूते हुए इस विश्वव्यापी समस्या पर शिद्दत के साथ चिंता व्यक्त की गयी है। कुल मिलाकर पुस्तक का जो निष्कर्ष है वह यह है कि यदि प्रकृति के इस असंतुलन को ठीक करना है साथ ही हमें सम्पूर्ण मानवता को मृत्यु की ओर रोकने से बचाना है तो पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक नागरिक को जागरूक होना पड़ेगा और इसके लिये पर्यावरण शिक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकती है। पर्यावरण शिक्षा से तात्पर्य पर्यावरण संरक्षण में जन सहभागिता बढ़ाना है। इसके लिये वर्तमान में र्प्यावरण की समस्या व इसके संरक्षण की दिशा में चिंतन व सोच का होना लाजिमी हो गया है। आशा है प्रस्तुत पुस्तक पर्यावरण के संरक्षण एवं इसके भावी नियोजन में मील का पत्थर साबित होगी।


भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन के विविध आयाम-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन के विविध सरोका
डॉ.रामेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी
पुस्तक - भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन के विविध आयाम
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे.एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 600.00
पेज - 18 + 293 = 311
ISBN - 978-81-8455-241-6

मनुष्य की प्रगति का इतिहास प्राकृतिक परिवेश से उसके सामंजस्यपूर्ण व्यवहार की कहानी है इसमें कोई दो राय नहीं कि पर्यावरण ने अपने असंख्य-संगठित समुदायों के साथ मनुष्य जीवन को खुशहाल एवं सुखमय बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। इसके मूल में शायद मनुष्य का प्रकृति के प्रति सद्भाव एवं सम्मानपूर्ण रवैया प्रमुख कारण रहे हैं।
डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव के सूक्ष्म अन्वेषी दृष्टि में पर्यावरण को वैदिक संस्कृति में क्या स्थान है के माध्यम से देश के चौंतीस विद्वान लेखकों के द्वारा इस पर विशद विवेचन एवं विश्लेषण किया गया है। भारतीय संस्कृति मानती है कि इस देह की रचना पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर) से ही हुई है। हमारे वैदिक ग्रन्थों में इन्हीं पंच-तत्वों को मानव मात्र के लिए शुभ-अशुभ, अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का सूचक भी माना गया है। चार खण्डों में विभाजित उपशीर्षकों के अन्तर्गत प्रथम के तहत वैदिक वाङ्मय में पर्यावरण स्वरूप एवं संरक्षण, द्वितीय में प्राचीन भारतीय पौराणिक ग्रन्थों में पर्यावरण शिक्षा, संरक्षण एवं जागरूकता, तृतीय खण्ड में भारतीय संस्कृति में पर्यावरण की प्रासंगिकता एवं उपादेयता तथा चतुर्थ खण्ड में वैदिक संस्कृति में पर्यावरण चिंतन के विविध आयामों विशेषकर यज्ञों के द्वारा र्प्यावरण संरक्षण कैसे किया जाये एवं ऋषि मुनियों के द्वारा दिए गए उपदेशों के माध्यम से इसके संरक्षण की विभिन्न विधियों तथा धार्मिक एवं नैतिक मान्यताओं के पीछे भी कहीं न कहीं पर्यावरण जागरूकता की छवि रही होगी। विवेचित एवं विश्लेषित किया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक में सम्पादकीय के माध्यम से लेखक ने इस बात की चिंता व्यक्त की है कि भले ही हम भूमण्डलीकरण एवं चहुँमुखी विकास की चर्चा करें और अपने को प्रगतिशील होने का ढोंग करते रहें; लेकिन ऋषि मुनियों द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त धारा अर्थात् प्रकृति के प्रति श्रद्धा सम्मान की बात तो दूर रही इसको सहज अपनी सहयोगिनी एवं पूरक सत्ता के रूप में देखने-समझने की समाज एवं विश्व के पास दृष्टि नहीं है ? प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से पर्यावरण की अनसुलझी गुत्थी को सुलझाने का प्रयास इन विद्वान लेखकों ने की है।

प्राकृतिक आपदाएं एवं मानवीय प्रबन्धन के विविध स्वरूप--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

प्राकृतिक आपदाएं बनाम मानवीय प्रबन्धन के विविध सरोकार
डॉ. रंजना श्रीवास्तव
पुस्तक - प्राकृतिक आपदाएं एवं मानवीय प्रबन्धन के विविध स्वरूप
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे.
एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 795.00
पेज - 19 + 325 = 344
ISBN - 978-81-8455-256-0

किसी भी प्रतिभा को शब्दों के चन्द लब्जों में कहना मुमकिन नहीं होता है, परन्तु पहचान देने के लिये उन्हें हम कोई नाम दे देते हैं। विद्वान भूगोलवेत्ता या प्रसिद्ध इतिहासविद् यह संज्ञा डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव के व्यक्तित्व पर सटीक न लगे परन्तु निश्चय ही एक लेखक एवं खोजपरक दृष्टि के कारण आप समसामयिक विषयों के मर्मज्ञ अध्येता की श्रेणी में आते हैं। प्रस्तुत सम्पादित ग्रन्थ प्राकृतिक आपदाएं एवं मानवीय प्रबन्धन के विविध स्वरूप नामक इस पुस्तक में विभिन्न सूचना एजेन्सियों एवं अनुसंधानकर्ताओं की रिपोर्टों के सर्वेक्षणों तथा अभिलेखागारों के सूक्ष्म विश्लेषण के द्वारा इसमें जो दुर्लभ सामग्री दी गई है। वह एक अमूल्य धरोहर के रूप में सदैव हमारे पास एक विरासत के रूप में पास रहेगी।
यह सच है कि प्राकृतिक विध्वंश को रोकना मनुष्य की सीमा के परे बात है। मगर समय पर सूचना मिलने और बेहतर प्रबन्धन से इन प्राकृतिक विपदाओं से होने वाली जान-माल को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके अनेक उदाहरण हमें देखने को मिल जायेंगे क्योंकि हर आपदा हमें बर्बाद करने के साथ-साथ आगाह भी करती है, लेकिन हम इसकी परवाह तक नहीं करते। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से सम्पादक ने उच्च शिक्षा से सम्बद्ध चौबीस प्राध्यापकों, भूगोलवेत्ताओं एवं पर्यावरणविदों के विचारों को रखकर इसे पांच उपखण्डों में विभाजित किया है। प्रथम खण्ड में आपदा प्रबन्धन के सैद्धान्तिक पहलुओं की चर्चा करते हुए इसके प्रारम्भ एवं रोकथाम की चर्चा की है। दूसरे खण्ड में आपदा प्रबन्धन के व्यवहारिक पहलुओं की चर्चा करते हुये सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर इसके प्रबन्धन पर प्रकाश डाला गया है। तृतीय खण्ड के तहत आपदा प्रबन्धन और प्रशासनिक सुधारों पर विस्तार से चर्चा की गई है। चतुर्थ खण्ड में प्राकृतिक आपदाओं का अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित किया गया है। पाँचवा खण्ड प्राकृतिक आपदा के विविध स्वरूपों एवं इसके विभिन्न प्रकारों का विश्लेषण करते हुए विभिन्न शोध पत्र इसकी त्रासदी को रोकने के लिए जनसामान्य को आगे आने के लिए आह्वान करते नजर आते हैं। विषय सामग्री की दृष्टि से हिन्दी में शायद यह पहली पुस्तक होगी जो शोधार्थियों, शोध अध्येताओं एवं इस विषय से सम्बद्ध विद्वानों को उपयोगी जानकारी प्रदान करेगी। ऐसी मेरी कामना है।

इक्कीसवीं सदी का पर्यावरण आन्दोलन चिन्तन के विविध आयाम--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

पर्यावरण आन्दोलन के विविध आयाम
डॉ आनन्द कुमार खरे
पुस्तक - इक्कीसवीं सदी का पर्यावरण आन्दोलन चिन्तन के विविध आयाम
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 725.00
पेज - 22 + 317 = 339
ISBN - 978-81-8455-242-3
पर्यावरण हमारी सम्पूर्ण मानवता के जीवन का आधार स्तम्भ है। परन्तु उपभोक्तावादी संस्कृति, जनसंख्या विस्फोट तथा निर्वनीकरण के कारण इसका ढाँचा असन्तुलित होता जा रहा है। अपनी भौतिकतावादी ध्वनि में रमा व्यक्ति यह सब भूल गया है कि प्रकृति की भी अपनी सीमायें एवं क्षमताएं हुआ करती हैं। लेकिन मनुष्य ने इन चिंताओं से दूर रहकर प्रकृति का जरूरत से ज्यादा दोहन एवं शोषण किया है। जिसके परिणामस्वरूप सूखा, बाढ़, महामारी, भूकम्प, भूस्खलन ओजोन परत का नष्ट होना, ग्लोबल वार्मिंग, अकाल जैसी अनगिनत प्राकृतिक आपदाएं नित्य विकराल रूप धारण करती जा रही हैं। यही कारण है कि आज पर्यावरण की समस्या की प्रतिध्वनि भूमण्डलीय समस्या के रूप में हम सबके साथ विद्यमान हो रही है। इन्हीं सब प्रस्तुत सरोकारों को विमर्श का रूप देने के लिए समसामयिक समस्याओं के प्रति जागरूक एवं पर्यावरण समस्या को शोधपरक से प्रस्तुत करने वाले डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की पुस्तक इक्कीसवीं सदी का पर्यावरण आन्दोलन: चिंतन के विविध आयाम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास के रूप् में चर्चित हुई है। देश के विभिन्न प्रान्तों से तैंतीस पर्यावरणविदों एवं शिक्षा जगत से सम्बद्ध प्राध्यापकों के द्वारा आठ खण्डों में विभाजित पर्यावरण की अवधारणा एवं विकास प्रक्रिया, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक प्रावधान, साहित्य में पर्यावरण चिंतन के विविध संदर्भ, पर्यावरण संरक्षण में प्राकृतिक सम्पदा का योगदान, पर्यावरण प्रदूषण एवं जल संरक्षण के विविध सरोकार, पर्यावरण प्रदूषण एवं पर्यावरण शिक्षा का मनोविज्ञान, जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी खतरे, इक्कीसवीं सदी का पर्यावरण: चिन्तन के विविध सन्दर्भ नामक उपशीषर्कों के द्वारा पर्यावरण की चिन्ता के विविध पक्षों पर गम्भीरता से विचार-विमर्श किया गया है। लगभग सभी लेखकों का मानना है कि भले ही हम जी बहलाने के लिए पर्यावरण प्रदूषण एवं धरती के बढ़ते तापमान के लिए पश्चिमी देशों (विशेष रूप से अमेरिका को) को दोषी ठहरायें। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम बेकसूर हैं। भले ही हम पृथ्वी पूजा एवं प्रकृति पूजा के ढेर सारे उदाहरण दें। परन्तु कहीं-न-कहीं इस दिशा में हम भी सीधे न ही सही पर दोषी हैं जरूर। यदि वास्तव में प्रकृति के इस संतुलन को ठीक करना है इसके साथ ही सम्पूर्ण मानवता को मृत्यु की ओर से रोकने को बचाना है तो पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक नागरिक को जागरूक होना पड़ेगा। प्रस्तुत पुस्तक पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सार्वभौमिक सोच एवं जागरूकता का परिचय कराती है। जो इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती को ब्रेक लगाती नजर आती है।

पर्यावरण: वर्तमान और भविष्य--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव




पर्यावरण के बहाने समाज को कुछ समझाने का प्रयास
डॉ. अजीत सिंह राही
पुस्तक: पर्यावरण: वर्तमान और भविष्य
लेखक: डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक: राधा पब्लिकेशन्स 4231/1 अंसारी रोड,दरियागंज ,नई दिल्ली.2
मूल्य: रू. 400.00

पृष्ठ : 12+179=191
ISBN: 799.81.7487.639.1

युवा रचनाकार डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव साहित्य के क्षेत्र में अपनी कृतियों के माध्यम से अपनी सशक्त उपस्थिति को दर्ज कराते रहते हैं। उनकी वर्तमान कृति ‘पर्यावरण: वर्तमान और भविष्य’ समाज को आईना दिखाने का कार्य करती है। पृथ्वी पर संतुलित जीवन के लिए आवश्यक है कि वहाँ पर्यावरण का संतुलन स्थापित रहे। आज जब जनसंख्या विस्फोट के कारण पया्रवरण विनाश तेजी से हो रहा है तब इस बात की नितांत आवश्यकता है कि हम स्वार्थगत् लाभों को त्यागकर समाज हित के कार्य करें।
डॉ. वीरेन्द्र की यह पुस्तक पर्यावरण के विविध आयामों से परिचय करवाती हुई वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास करती है। जीवन जीने की आपाधापी में मानव सही गलत की पहचान करना ही भूल गया है। उसने अपने प्रत्येक कदम को स्वार्थपूर्ति हेतु उठाना प्रारम्भ कर दिया है। बिना सोचे समझे कार्य करने की मानवगत् शैली के कारण समाज को पर्यावरण संकट का सामना करना पड़ रहा है। जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, रेडियोधर्मी प्रदूषण सहित तमाम तरह के प्रदूषण मानव प्रदत्त ही कहे जा सकते हैं।
पर्यावरण के बारे में विस्तार से बताती यह पुस्तक पर्यावरण के एक-एक पहलू पर प्रकाश डालती है। पर्यावरणीय समस्याओं की उत्पत्ति के पीछे छिपे कारणों को डॉ. वीरेन्द्र किसी सिद्धहस्त पर्यावरणविद् की तरह प्रकट करते हैं। प्रदूषण की उत्पत्ति हो अथवा उसकी वातावरण में मात्रात्मक उपस्थिति; पर्यावरण प्रदूषक हो अथवा प्रदूषण के स्रोत; मानव स्वास्थ्य पर प्रदूषण का प्रभाव हो अथवा प्रदूषण रोकथाम के उपाय सभी को विस्तार से चित्रों, तालिकाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।
पुस्तक पढ़ते समय कई बार यह बड़ा ही भयावह सा प्रतीत होता है जबकि विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के कारण पृथ्वी पर मानव जीवन ही खतरे में पड़ जायेगा। यह कृति अपने आपमें इस कारण भी अनूठी कही जा सकती है क्योंकि पर्यावरण से सम्बन्धित तमाम सारी जानकारियाँ देने के साथ ही साथ यह पर्यावरण और मानव का आपसी सम्बन्ध भी स्थापित करती दिखती है।
यह गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाये तो इस पुस्तक के द्वारा ज्ञान भण्डार में वृद्धि ही की जा सकती है। पर्यावरण कानून क्या है ? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? भारतीय संविधान के अनुसार राज्य एवं समवर्तीी सूची में पर्यावरण कानून किस प्रकार का है ? विभिन्न प्रदूषणों से सम्बन्धित कानून क्या-क्या हैं ? विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं की पर्यावरण-संरक्षण के प्रति क्या भूमिका है ? विश्व स्तर पर पर्यावरण-संरक्षण के क्या उपाय किये जा रहे हैं ? आदि-आदि ऐसे प्रश्न हैं जिनकी जिज्ञासा प्रत्येक मन में होती है। इन प्रश्नों के अतिरिक्त भी अनेक प्रकार की जिज्ञासाओं का समाधान लेखक ने बड़ी ही सहजता से किया है।
पर्यावरण सम्बन्धी विविध जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही डॉ. वीरेन्द्र ने एक प्रकार का अनूठा प्रयोग किया है। पुस्तक के अन्त में लेखक ने देश के प्रमुख समाचार-पत्रों में प्रकाशित गम्भीर पर्यावरणीय समाचारों को भी स्थान दिया है। लेखक के इस प्रयास से वे अछूते सन्दर्भ भी सामने आ सके हैं जो समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ मात्र बनकर रहे जाते थे। निःसन्देह डॉ. वीरेन्द्र की यह कृति पर्यावरण संकट से उपजी पीढ़ा का प्रतिबिम्ब है जो समाज को कुछ बताने का, समझाने का एक प्रयास समझा जा सकता है।

प्रसाद का नाट्य गौरव स्कन्द गुप्त-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव



प्रसाद का नाट्य गौरव - स्कन्दगुप्त
डॉ. नीरज द्विवेदी
पुस्तक - प्रसाद का नाट्य गौरव स्कन्द गुप्त
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 300.00

पेज - 8 + 109 = 117
ISBN - 978-81-8455-275-1

भारतीय संस्कृति जिसमें त्याग का गौरव है, विजय की शक्ति है, करूणा की तरलता है और क्षमा की अनुकम्पा है। इसमें वह शक्ति है कि यह पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध को रोक सकती है। जयशंकर प्रसाद ने लगभग अपने सभी नाटकों में इसी संस्कृति की एक नवीन दिशा एवं आलोक प्रदान किया है। जो हमारे लिए अनुकरणीय है।
आज के व्यस्ततम व भौतिकवादी आपाधापी के इस युग में फँसे लोगों के पास चिन्तन व मनन के लिए वक्त नहीं है। परन्तु इन विषम स्थितियों में भी निरन्तर परिश्रम और राष्ट्र की प्रगतिशीलता के प्रति प्रतिबद्ध सम्पादक द्वय डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव व डॉ. कमलेश सिंह समय-समय पर अपने शिक्षा एवं ज्ञान के द्वारा अनवरत लोगों को जागरूक करते रहते हैं। जहाँ तक राष्ट्र के गौरव एवं कीर्तिमान की बात है तो उसके प्रति भी डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव एवं डॉ. कमलेश सिंह में प्रबल आस्था देखने को मिलती है। इसी आस्था एवं विश्वास की कड़ी में इनके द्वारा सम्पादिक पुस्तक प्रसाद का नाट्य गौरव: स्कंद गुप्त में युवा लेखकों ने अपने अठारह लेखों के माध्यम से स्कन्दगुप्त नाटक के भिन्न-भिन्न कोणों से विवेचना की है। महत्वपूर्ण यह नहीं हैं कि इस संकलन के सभी लेखक युवा हैं बल्कि यह है कि स्कन्दगुप्त जैसे नाटक पर इतनी दुर्लभ सामग्री की इतनी नवीन व्याख्या इतनी पैनी नजरों से शायद ही कहीं देखने को मिले, क्योंकि युवा लेखकों से इन स्कन्द गुप्त नाटक की आलोचना का कोई क्षेत्र छूट नहीं पाया है।
जयशंकर प्रसाद ने स्वयं अपनी इतिहासप्रियता के विषय में लिखा है - हमारी गिरी दशा को उठाने के लिए हमारे जलवायु के अनुकूल जो हमारी अतीत सभ्यता है, उससे बढ़कर उपयुक्त और कोई भी आदर्श हमारे अनुकूल होगा कि नहीं इसमें हमें सन्देह है। इतिहास का अनुशीलन किसी भी जाति को अपना आदर्श संगठित करने के लिए अत्यन्त लाभदायक होता है। मेरी इच्छा भारतीय इतिहास के प्रकाशित अंश में उसे उन प्रकाण्ड घटनाओं का दिग्दर्शन कराने की है जिन्होंने हमारी वर्तमान स्थिति को बचाने का बहुत प्रयत्न किया है। प्रसाद के नाटकों की विशिष्टता यह है कि उसमें पूर्वी नाट्य परम्परा और पश्चिमी नाट्य का मिश्रण ही नहीं अपितु स्वयं उनकी मौलिकता का भी दिग्दर्शन है। इसके साथ ही भारतीय अतीत की गौरवमयी परम्परा इतिहास के पृष्ठों से राष्ट्रीय चरित्र को उभारने वाले व्यक्तियों की पहचान और पौराणिक कथाओं से सन्दर्भ लेकर समकालीन सामाजिक स्थितियों को प्रकाश में लाना, इनके नाटकों का कथन की और उद्देश्य की दृष्टि से भी एक अलग महत्व है। हमें आशा है कि युवा आलोचकों का यह प्रयास नाट्य आलोचना के क्षेत्र में नये आयामों की तलाश करता दिखाई देता है। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं कि साहित्य तथा संस्कृति के मठी आचार्यों के तालाब में जलकुम्भी की तरह छा जाना किसे नहीं खटकता है। ये जल कुम्भियां ऐसे ही प्रयासों से हटायी जा सकती हैं।
जयशंकर प्रसाद में (विशेषकर स्कन्दगुप्त) में रूचि रखने वाले पाठकों, शोध छात्रों, प्रतियोगी परीक्षाओं (आई. ए. एस., पी. सी. एस.) को देने वाले युवाओं के लिये यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी। ऐसी हमारी मान्यता है।








भोजपुरी विमर्श-- डॉ. पुनीत बिसारिया, डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

भोजपुरी विमर्श के विविध सरोकार
डॉ. सुरेन्द्र प्रताप सिंह यादव
पुस्तक - भोजपुरी विमर्श
लेखक - डॉ. पुनीत बिसारिया, डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - निर्मल पब्लिकेशन, ।.139 गली नं. 3, कबीर नगर, शाहदरा, दिल्ली- 94
मूल्य - 225.00
पेज - 8 + 135 = 143
ISBN - 81-86400-007-9

आज जब सब कुछ नया सृजित किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर विरासत का अकस्मात विनाश भी किया जा रहा है। परन्तु इस सब के बीच कुछ सभ्रान्तजन ऐसे भी होते हैं जो अपनी संस्कृति, संस्कार एवं लोक आस्थाओं के प्रति लगाव रखते हुए उनके संरक्षण की बात सदैव करते हैं। उनमें ऐसा ही प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय कार्य लेखक द्वय डॉ. पुनीत बिसारिया एवं डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव कर रहे हैं। इन्हीं सब सरोकारों को प्रस्तुत सम्पादित पुस्तक के माध्यम से भोजपुरी भाषा के विविध पहलुओं पर गागर में सागर भरने वाली बात इक्कीस शोध पत्रों के माध्यम से कही गयी है। जैसा कि इस पुस्तक की सम्पादकीय से स्पष्ट है कि भोजपुरी विमर्श इक्कीसवीं सदी के प्रमुख सरोकारों में एक हो गया है, जिसने अब तक अपेक्षित किन्तु जन सापेक्षता की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण भोजपुरी भाषा को साहित्यिक विमर्श की परिधि से हटाकर धुरी पर ला खड़ा किया है। वास्तविकता यह है कि आज भोजपुरी के लोक साहित्य के सरोकारों पर न सिर्फ गम्भीर चर्चा हो रही है, बल्कि इसके भाषा वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक तथा साहित्यिक पक्षों को भी प्रकाश में लाने का समारम्भ हो चुका है। आज जिस प्रकार भोजपुरी फिल्मों, धारावाहिकों एवं लोकगीतों की लोकप्रियता बढ़ रही है उसने इस कर्णप्रिय जनपदीय भाषा के विविध पक्षों पर समग्र विमर्श हेतु बाध्य किया है।
अपनी सरलता तथा सीधी-सादी-भाषा के कारण भोजपुरी भाषा का व्याकरण बड़ा ही सरल है। इसमें विभिन्न प्रकार के भावों और रसों को प्रकाशित करने की अपूर्व क्षमता मिलती है। अर्थात् साहित्य नुरागियों से अब यह बात छिपी नहीं रही कि भोजपुरी साहित्य का विकास और उसकी मधुरता जगप्रसिद्ध है जो जनसाधारण को अनायास अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है।
भोजपुरी भाषा के विविध पक्षों से साक्षात्कार कराती प्रस्तुत सम्पादित पुस्तक में भोजपुरी के उद्भट विद्वानों के शोधपरक आलेखों को रखा गया है जिसमें भोजपुरी भाषा की विभिन्न प्रवृत्तियाँ लोक संस्कृति के आइने में भोजपुरी भाषा के उद्भव एवं विकास से लेकर लोक, कला, संस्कृति, नारी स्वाभिमान, राष्ट्रीय चेतना को तो दर्शाया ही गया है इसके साथ ही विदेशों में इसके प्रचार-प्रसार एवं फैलाव की भी चर्चा प्रस्तुत लेखों के माध्यम से इन विद्वान लेखकों ने की है।
भोजपुरी आन्दोलन एवं इसकी विदेशों में बढ़ती लोकप्रियता के कारण संविधान की भाषा अनुसूची में इसे शामिल करने वाली मांग को देखते हुए भोजपुरी पर पुस्तक का अभाव लम्बे समय से देखा जा रहा था, हमें उम्मीद है कि प्रस्तुत पुस्तक इस अभाव को पूरा करती नजर आयेगी।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

लोक संस्कृति के आइने में भोजपुरी भाषा (चिन्तन के विविध आयाम)--डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव


भोजपुरी भाषा का लोक संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में सिंहावलोकन

डॉ शम्स आलम

पुस्तक - लोक संस्कृति के आइने में भोजपुरी भाषा (चिन्तन के विविध आयाम)

लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी. जी. 4, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली

मूल्य - 895.00

पेज - 24 + 393 = 417

ISBN - 978-81-8455-239-3


भोजपुरी साहित्य, कला, संस्कृति की मनोरम झांकी का अवलोकन कराने वाली डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की सद्यः प्रकाशित पुस्तक भोजपुरी भाषा एवं लोकजीवन के सुःख-दुःख, हर्ष-विवाद, आशा-निराशा के श्वेत एवं श्याम पक्षों का उद्घाटन कर लोकसाहित्य आन्दोलन के विमर्श को एक नूतन आयाम देती नजर आती है। सात खण्डों में विभाजित विशेषकर लोक संस्कृति एवं भोजपुरी भाषा का उद्भव और विकास, भोजपुरी कथा साहित्य का अनुशीलन, भोजपुरी लोकगीतों में लोक संस्कृति के विविध आयाम, भोजपुरी भाषा में स्त्री विमर्श के मर्मस्पर्शी पहलू, भोजपुरी लोक कला और संस्कृति, कृतित्व के आइने में भोजपुरी चिंतकों के विविध सरोकार तथा भोजपुरी भाषा में चिंतन के विविध संदर्भों को व्याख्यायित एवं विवेचित पुस्तक में भोजपुरी के बढ़ते कदमों एवं महत्व को देश के विभिन्न प्रान्तों के उच्च शिक्षा से सम्बद्ध प्राध्यापकों ने अपने विचार रखे हैं। इन सभी लेखकों ने यह स्वीकार किया है कि भोजपुरी भाषा मात्र एक अंचल की भाषा न होकर इसका विस्तार सात समुन्दर पार तक भी है। अर्थात् बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश के महानगरों के अलावा भारत के बाहर नेपाल, मॉरीशस, फिजी, ट्रिनीनाद, गुयाना, सूरीनाम, वर्मा इत्यादि देशों तक इस भाषा व बोली का प्रचार-प्रसार है। इसमें कोई शक नहीं है कि हिन्दी भाषा के बाद भोजपुरी भारत में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। यही कारण है कि अपनी आत्मीयता के कारण भोजपुरी भाषा विदेशों में अप्रवासियों की आत्मा में आज भी जीवंत है। भोजपुरी के हर क्षेत्र में बढ़ते स्वर्णिम कदम साहित्य, कला (विशेषकर सिनेमा जगत) संस्कृति को देखते हुए ऐसा लगता है अब भोजपुरी की उपेक्षा बहुत अधिक समय तक नहीं की जा सकती है और निश्चित ही इसका भविष्य स्वर्णिम होगा। हमें ऐसा विश्वास है कि प्रस्तुत पुस्तक लोक, कला, संस्कृति एवं भाषा विज्ञान में रूचि एवं शोधरत विद्वानों के लिए मील का पत्थर साबित होगी।

नई सहस्त्राब्दी का स्त्री-विमर्ष: साहित्यिक अवधारणा एवं यथार्थ -- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव





नई सहस्त्राब्दी का स्त्री-विमर्श: मिथक एवं यथार्थ डॉ हेमा देवरानी

पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी का स्त्री-विमर्ष: साहित्यिक अवधारणा एवं यथार्थ

सम्पादक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन, 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली

मूल्य: रू. 495.00

पृष्ठ : 22+224=246

ISBN -- 978-81-7487-659-1

स्त्री मुक्ति आन्दोलन को आगे बढ़ाने वालीं तथा नारी जीवन को जीवन जीने का नया स्वर प्रदान करने वाली प्रगतिशील नारियों को समर्पित पुस्तक ‘नई सहस्त्राब्दी का स्त्री-विमर्ष: साहित्यिक अवधारणा एवं यथार्थ’ स्त्री-लेखन से जुड़े और स्त्री-चिन्तन से सम्बन्धित विविध पहलुओं पर विस्तार से चर्चा के नये आयाम स्थापित करता है। डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव के कुशल सम्पादन में कुल 38 लेखों में स्त्री-विमर्श के सकारात्मक पहलुओं पर शोधपरक दृष्टि आरोपित कर उसका साहित्यिक मूल्यांकन किया गया है। स्त्री लेखन और उसकी अस्मिता, स्त्री लेखन के चिन्तनपरक सरोकारों के अतिरिक्त कृतित्व के आधार पर नारी चेतना के विविध आयामों को विस्तृत दृष्टिकोण प्रदान किया गया है। स्त्री-विमर्श के नाम पर स्त्री के स्वतन्त्र दृष्टिकोण को उभारने का प्रयास इस पुस्तक के द्वारा होता आसानी से दिखता है। नारी चेतना का स्वरूप हिन्दी साहित्य के आविर्भाव से अद्यतन उपस्थित रहा है और नारी का संघर्ष भी इसी समय के साथ-साथ चलता रहा है। स्वामी विवेकानन्द का कथन कि स्त्रियों की अवस्था में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई मार्ग नहीं। किसी भी पक्षी का एक पंख के सहारे उड़ना नितान्त असम्भव है, समाज में स्त्री को पुरुष के बराबर का स्थान प्रदान करता है। इस बराबरी के स्थान का पर्याप्त ‘स्पेस’ डॉ0 वीरेन्द्र निर्मित करते नजर आये हैं। महिलाओं की भूमिका को साहित्य के विविध प्रतिरूपों में दर्शाते हुए उसके शोषण-संघर्ष को तो रेखांकित किया ही है साथ ही स्त्री की विकासपरक मनोवृत्ति का भी चित्रण किया है। साहित्यिक धरातल पर स्त्री-विमर्श के नाम पर कुछ कालजयी रचनाओं और रचनाकारों के द्वारा स्त्री-चेतना की सशक्तता को भी स्थान प्राप्त हुआ है। मीराबाई को भारतीय स्त्री-विमर्श संदर्भ में अग्रणी स्थान प्राप्त है जिसने तत्कालीन अभिजात्य वर्ग की, पुरुषवाद की सामंती सोच से सीधे-सीधे विद्रोह कर संघर्ष किया था वहीं दूसरी ओर स्वतन्त्रता के आसपास की महिला कथाकारों में कृष्णा सोबती का उग्र बुर्जुआ लेखन स्त्री की स्वतन्त्र छवि का पोषण करता भरतीय संदर्भों में अपने आप में क्रान्तिकारी कदम था। स्त्री-विमर्श के ऐसे स्तम्भों को प्रमुखता के साथ स्थान देना सम्पादक का स्त्री-विमर्श और स्त्री-चिन्तन के प्रति सकारात्मकता को ही सिद्ध करता है। स्त्री को हाशिए पर हमेशा से रखा जाता रहा है और उसकी इस स्थिति को साहित्य में स्थान भी प्राप्त होता रहा है किन्तु 21वीं सदी के साहित्य जगत की विस्मयकारी घटना हाशिए की औरत सेक्सवर्कर की आत्मकथा का आना रहा है। इससे पहले अपने-अपने क्षेत्र के स्वनामधन्य लोगों को आत्मकथा का लेखन अथवा स्त्रियों द्वारा आत्मकथा लिखना उनके स्वतन्त्र चिन्तन को परिभाषित करता रहा है किन्तु साहित्य के तथा समाज के हाशिये पर खड़ी एक स्त्री की आत्मकथा को तथा एक अन्य दलित स्त्री के शोषण-संघर्ष को इस पुस्तक में स्थान मिलना स्त्री के प्रति सकारात्मक तथा विस्तारपरक सोच का प्रतीक है। स्त्री चेतना के साहित्यिक स्वरूप का विस्तृत फलक होने के बाद भी स्त्री-विमर्श के सम्बन्धों में नया व्याकरण तलाशा जा रहा है। स्त्री-विमर्श की अस्मिता के यक्ष प्रश्नों से दो-चार होते हुए, इस पुस्तक की पठन यात्रा से गुजरते हुए बीच-बीच में कहीं एहसास होता है कि स्त्री को अब तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

हिन्दी कथा साहित्य में पारिवारिक विघटन -- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

समकालीन कथा साहित्य में सम्बन्धों की त्रासदी का चरम आख्यान

डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर पुस्तक हिन्दी कथा साहित्य में पारिवारिक विघटन लेखक डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव प्रकाशक नमन पब्लिकेशन्स,4231/1 अंसारी रोड , दरियागंज,नई दिल्ली

मूल्य रु. 450.00

पृष्ठ : 14+175=189

ISBN - 81-86400-001-X एक ऐसा व्यक्तित्व जो न किसी तरह का दिखावा करता है और न ही अपने विचारों को किसी पर आरोपित करता है वह केवल संघर्ष-स्नात चेहरा वाला व्यक्तित्व जिसने अपने श्रम-बिन्दुओं से अपनी जिजीविषा को वह विशिष्ट पहचान दी है जो किसी विरले को ही प्राप्त होती है। वह व्यक्तित्व है डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव का जो डी. वी. महाविद्यालय में हिन्दी के वरिष्ठ प्रवक्ता हैं और समकालीन साहित्यिक, सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं पर अपनी पैनी एवं सक्रिय दृष्टि रखते हैं। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की नवीन पुस्तक हिन्दी कथा साहित्य में पारिवारिक विघटन, चौदह अध्यायों में विभाजित इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डी. फिल. उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबन्ध का परिष्कृत भाग है। युवा विद्वान लेखक डॉ. वीरेन्द्र यादव अपनी भूमिका में इस पुस्तक के बारे में कहते हैं कि यह पुस्तक मेरे प्रारम्भिक चिंतन का ब्लू प्रिन्ट मात्र ही है अर्थात् यह पुस्तक मेरे व्यवस्थित दृष्टिकोण या दृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में आरम्भिक कड़ी मानी जा सकती है। कुल मिलाकर यह कहा जाए तो उचित ही होगा कि अभी इसका विस्तार एवं परिमार्जन होना शेष है। यह लेखक की व्यक्तिगत सोच ही कही जायेगी क्योंकि यह उनकी पहली पुस्तक है और मेरा मानना है कि इस पहली पुस्तक में ही लेखक का इतना गम्भीर चिंतन झलकता है कि जिसमें सम्पूर्ण सामाजिक यथार्थ का युगबोध परिलक्षित होता है। मैं शिक्षक का सर्वप्रथम गुण समझता हूँ उसका आकर्षण। वह आकर्षण चाहे शिक्षक के रूप में हो, साहित्यकार के रूप में हो, वक्ता के रूप में हो, चाहे व्यक्ति के रूप में। अंग्रेजी में एक विद्वान ने कहा भी है कि । ज्मंबीमत उनेज इम ेमस िमििनसहमदज अर्थात् एक शिक्षक में दीप्ति होना आवश्यक है। दीप्तिहीन शिक्षक किसी को उत्कृष्ट नहीं कर सकता। डॉ. वीरेन्द्र यादव वाक सिद्ध हैं। ‘‘आपको वाक शक्ति मिली है इसलिये जब वे बोलते है। तब उन्मुक्त होकर दीप्ति के साथ सबको प्रभावित करते हैं।चौदह अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक की यात्रा पारिवारिक विघटन: समस्या एवं समाधान से आरभ होकर हिन्दी कहानियों एवं उपन्यासों की यात्रा से इसका अन्त होता है। पारिवारिक विघटन की समस्या को लेकर डॉ. वीरेन्द्र यादव का अपना एक विशिष्ट निष्कर्ष इन रचनाओं के लेखन के सन्दर्भ में दृष्टिगत रखते हुये आया है। युवा विद्वान लेखक का मानना है कि वर्तमान संक्रमणशील समाज में मूल्य विघटन की प्रक्रिया से सम्बन्धों में बिखराव आ रहा है और आज सम्बन्धों को किसी ठोस धरातल पर स्थापित करना कठिन होता जा रहा है। आज सभी सम्बन्ध एक दबाव की नियति से गुजर रहे है तथा मानव मन आस्था, विश्वास एवं भावनात्मक गहराई के अभाव में कमजोर होता जा रहा है। प्रेम सम्बन्ध कंुठाओं के शिकार हो रहे हैं। दाम्पत्य सम्बन्धों में मुक्त भोग एवं अहम का विस्फोट हो रहा है तथा अन्य पारिवारिक सम्बन्ध आर्थिक अभावों एवं भावनात्मक लगाव की कमी के कारण कृत्रिम और मशीनी होते जा रहे है। उच्चतर मूल्यों में आस्था पारिवारिक सम्बन्धों को विकृत कर रही है। मैत्री सम्बन्ध गहन, संवेदना, पारस्परिक समझ और सहानुभूति के अभाव में समय काटने या सामाजिक औपचारिकताएं निभाने तक सीमित हो गये हैं। स्त्री -पुरुष के सम्बन्धों की यह स्थिति और परिणति पूरी कचोट भरी वेदना के साथ आज के कथा साहित्य में आकार पा रही है। पारिवारिक जीवन की विसंगतियों से उपजा यह पीड़ा बोध न केवल कथा साहित्य का ही विषय है वरन यह समूची पीढ़ी द्वारा भोगा जा रहा है यथार्थ का अनिवार्य सोपान भी है। विघटन के इस स्वरूप को डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने अपनी पुस्तक में विभिन्न रूपों में रेखांकित है जिनमें अकेलापन, परम्परागत मान्यताओं और नैतिक बोध का पतन, आधुनिक नारी के परिवर्तित जीवन के कारण ,वर्तमान में बदलते स्त्री पुरुष सम्बन्धों के कारण, आर्थिक दबाव एवं मूल्यों के पतन, पीढ़ी संघर्ष, अस्तित्व रक्षा एवं उत्कट जिजीविषा के साथ-साथ ऐतिहासिक ,सामाजिक, मार्क्सवादी, राजनीतिक घटनाओं के साथ व्यक्तिपरक व्यक्तिवादी स्वरूप के कारण भी पारिवारिक विघटन के स्वरूपों केा विश्लेषित एवं मूल्यांिकत करने का सफल प्रयास प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से किया गया है। लेखक का मानना है कि वर्तमान समय में आज मानवीय सम्बन्ध अपनी विस्फोटक स्थिति में आ गये हैं और नये परिवर्तनों की आहट के लिए हमें तैयार रहने के लिए सजग रहना होगा। प्रस्तुत पुस्तक समकालीन समस्यायों पर नई दृष्टि रखने वाले पाठकों के लिये महत्वपूर्ण होगी।

मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी -- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव



वर्तमान सम्बन्धों के विघटन का जीवंत यथार्थ डॉ दिव्या माथुर पुस्तक :मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी लेखक :डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव प्रकाशकः :नमन पब्लिकेशन्स,4231/1अंसारी रोड ,दरियागंज,नई दिल्ली-110002 मूल्य रु. 400.00 पृष्ठ : 22+186=208 ISBN: 979.86129.237.5

वस्तुतः अतीत सदैव वर्तमान पर अपने प्रहार करता रहता है। यह तो उस व्यक्ति-विशेष पर आधारित होता है कि वह कितना उसे सह पाता है या प्रेरणा लेकर भविष्य का वाङ्मय रचता है। परम्परा से चली आ रही विकृतियों को समकालीन नजरिये से अवलोकन करने का जो वैचारिक औदार्य एवं सैद्धान्तिक अडिगता डॉ. वीरेन्द्र यादव के साहित्य में है। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की सद्यः प्रकाशित पुस्तक मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी में वर्तमान समय की पारिवारिक विसंगतियों का जीवन्त वर्णन किया गया है। चार अध्यायों में विभाजित मोहन राकेश की सभी रचनाओं, कहानी, उपन्यास, नाटक एवं संस्मरणों को युवा विद्वान लेखन ने आधुनिक नजरिये से रेखांकित करने की कोशिश की है। आपका मोहन राकेश के बारे में मानना है कि मोहन राकेश की रचनाओं में परिवार का परम्परागत ढाँचा छिन्न-भिन्न सा हो गया है। स्त्री-पुरुष का निजीपन मानों आज की भीड़ में (विशेषकर महानगरों में) कहीं खो सा गया है उसे सबके बीच में जीते-जीते भी उफ, उदासी और आत्मीयहीन अपरिचय के साथ जीना पड़ रहा है। वर्तमान की वास्तविकता भी यही है कि आज स्त्री-पुरुष अपने जीवन में कई समस्याओं के बीच फंस गये हैं। दोनों मन ही मन कई समस्याओं में उलझे हुए है। कल्पनाएं यथार्थ के ताप में जलकर झुलस गई हैं, विवाह हुआ पर नौकरी नहीं, नौकरी मिली तो सन्तोषप्रद नहीं और जीवन की इच्छापूर्ण बन सके इतनी आय वाली नहीं, बोझ ढोते चल रहे हों वैसा महसूस होता है। पुरुष-पत्नी की खोज में भीतर ही घुलता जा रहा है, स्त्री भी बार-बार सहते-सहते विद्रोही तेवर अख्तियार करने पर उतारू हो गई है ।दोनों का मनद्विधाग्रस्त हो गया है अतीत इससे अच्छा था,वे अतीत में जाना चाहते हैं वे बहुत कुछ सोचतें हैं पर कुछ कर नहीं सकतें हैं आखिर विवश भाव से सभी.परिस्थितियांें को आज के दम्पत्ति झेल रहें हैं किसी के जीवन में आनन्द नहीं,उत्साह नहीं बस है तो टूटन,विवशता,ऊब तथा निराशा ,जिसमें वह म नही मन डूबता-उतराता रहता है स्त्र्ाी-पुरूष के सम्बन्धेंा की यह स्थितिऔर पूरी कचोट भरी वेदना के साथ आज की रचनाओं में आकार पा रही है। जीवन की विसंगतियों से उपजा यह पीड़ा बोध न केवल मोहन राकेश की रचनायों का विषय है वरन् समूची पीढ़ी द्वारा चित्रित कथा साहित्य का अनिवार्य सोपान भी हैं।आचार्य तुलसी ने लिखा है कि -‘लेखनी और वाणी ये दो बड़ी शक्तियां हैं जिनके द्वारा व्यक्ति-लोक जीवन में प्रवेश करता है, उस पर प्रभाव छोड़ता है और उस युग की सभ्यता एवं संस्कृति को अपने अस्तित्व से अनुप्राणित कर देता है। लेखनी और वाणी दोनों बहने हैं, दोनों का अपने-अपने स्थान पर पूरा मूल्य है क्योंकि उसके कंधे पर सवार होकर ही मनुष्य का चिंतन सम्पादित होता है।’’ और ये दोनों बहने डॉ. वीरेन्द्र यादव जैसे योग्य पात्र के साथ संयुक्त होकर कृत-कृत्य हैं।

लेखक का मानना है कि मोहन राकेश समकालीन कथाकारों में अन्यतम हैं। आपने हिन्दी कथा को आडम्बर, कृत्रिमता, सस्ती भावुकता और जुमले से अलग करके एक आत्मीय रिश्ता प्रदान किया। यही कारण है कि मोहन राकेश के कथा साहित्य में संवेदना की आधुनिकता है, अनुभव का खरापन है और सम्प्रेषण का यथार्थ आधार है। मोहन राकेश की रचनाओं विशेषकर कहानी, उपन्यास और नाटकों में अधिकतर पारिवारिक विघटन के बीच आर्थिक सम्बन्धों की त्रासदी के अनेक कारण स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते है, जिनमें व्यक्तिगत सम्बन्धों का अहम ,आर्थिक कारण, मानवीयता एवं मूल्यों के पतन के कारण, समकालीन भ्रष्टाचार के साथ विभाजन की त्रासदी के कारण भी पारिवारिक सम्बन्धों में खटास उत्पन्न हो रही है। पारिवारिक विघटन की प्रमुख रचनाओं में एक और जिन्दगी, गुंझल, सुहागिनें (कहानी) अंधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल, अन्तराल (उपन्यास) तथा नाटकों में आधे-अधूूरे, आषाढ़ का एक दिन एवं लहरों के राजहंस में विशेष रूप से देखने को मिलता है। यहाँ पुस्तक के अवलोकन से मैं यह कहना चाहूँगा कि वर्तमान युग जीवन में टूटते मानवीय सम्बन्धों और मूल्यों के फलस्वरूप व्यक्ति के आन्तरिक विघटन के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को भी स्वर देने का प्रयत्न किया गया है जो वर्तमान परिवेश की विसंगतियों से उद्भूत युग सत्य है।

डॉ. वीरेन्द्र यादव प्रस्तुत पुस्तक में यह स्पष्ट करते हैं कि मोहन राकेश के उपन्यास और कहानी का सफर सचमुच डिप्रेसिंग है, क्योंकि लेखक जो प्रश्न उठाता है, उसका उत्तर दुनिया से नहीं अपने आपसे मांगना होता है और इस मुकाम पर हम अपने ही सामने निर्वस्त्र होने को विवश होते हैं, वरना उन समस्याओं का अवसर मिल ही नहीं सकता है। मानवीय सम्बन्धों को एक नयी दृष्टि और हृदय की अटल गहराई को कुरेदने वाले राकेश जी ने जिंदगी भर मानवीय सम्बन्धों पर विचार किया क्योंकि उनकी मान्यताएं पुरानी लीक छोड़कर समाज को देखने की एक नवीन दृष्टि रखती थी। प्रस्तुत पुस्तक शोधार्थियों, अध्येयताओं एवं प्राध्यापकों के लिये उपयोगी होगी ऐसी मेरी मान्यता है।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के विविध आयाम -- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव






राष्ट्रभाषा हिन्दी के विविध आयाम डॉ. धनंजय सिंह पुस्तक: राष्ट्रभाषा हिन्दी: विचार नीतियां और सुझाव लेखक: डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव प्रकाशक: नमन पब्लिकेशन्स, 4231/1 अंसारी रोड,दरियागंज ,नई दिल्ली.2 मूल्य: रू. 250.00 पृष्ठ : 12+128=140 ISBN - 978-81-8129-234-0

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भूमण्डलीकरण के इस दौर में जबकि हमारे सामने भाषा का संकट स्वरूप रूप से दिख रहा है, तब हिन्दी भाषा के उन्नयन की बात करना निश्चय ही प्रेरणास्पद है। हिन्दी साहित्य क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद’ की संकल्पना को स्थापित करने वाले युवा आलोचक डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की समीक्ष्य कृति हिन्दी भाषा की विकास-यात्रा के विविध आयाम प्रस्तुत करती है। हिन्दी भाषा के प्रति अपनी लगन को स्पष्ट करते हुए डॉ. वीरेन्द्र ‘जमीनी कार्य करने की आवश्यकता’ पर बल देते हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी: विचार नीतियां और सुझाव पुस्तक तेरह अध्यायों में विभाजित है और इसके प्रत्येक अध्याय का विषय इतना व्यापक एवं गम्भीर है कि उसमें राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति कहीं कुछ धुंधलका शेष बचता ही नहीं है। लेखक ने हिन्दी के नये आँकड़ों से अवगत कराते हुये लिखा है कि अपने विशाल शब्द भण्डार, वैज्ञानिकता, शब्दों और भावों के आत्मसात की प्रवृत्ति के साथ हिन्दी ज्ञान विज्ञान की भाषा के रूप में उपयुक्तता एवं विलक्षणता के कारण आज हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में सर्वत्र मान्यता मिल रही है। लगभग 80 करोड़ आमजनों द्वारा विश्व के 176 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। नव्यतम आँकड़े यह कहते हैं कि विश्व में हिन्दी बोलने वाले अब पहले स्थान पर हो गये हैं।’’ वास्तविकता यह भी है कि वर्तमान में हिन्दी भारत सहित विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक बोली, पढ़ी-लिखी तथा समझी जाती है। यही कारण है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी, चीनी एवं अंग्रेजी को पीछे छोड़ते हुए विश्व की प्रथम भाषा हो गयी है जो सर्वाध्किा आम जनता (अस्सी करोड़ से अधिक) द्वारा स्वेच्छा से बोले जाने वाली भाषा है। लेखक की मान्यता है कि आज हिन्दी भाषा साहित्य लेखन, वाचन तथा गायन आदि के रिवाज से हटकर अब दैनंदिन जीवन से लेकर विज्ञान प्रौद्योगिकी व्यापार-प्रबंधन आदि प्रत्येक क्षेत्र में यह अपनी उपस्थिति दर्शा चुकी है क्योंकि भाषा के इस नव्यतम रूप का युगानुकूल परिवर्तन एवं नवसृजन अत्यन्त तीव्र गति से हो रहा है। इसका प्रमुख कारण विश्व स्तर पर बढ़ रहे आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक अन्तः सम्बन्धों के कारण वैचारिक स्तर पर एक वैश्विक चेतना का प्रादुर्भाव हो रहा है जिससे समूचे विश्व में हिन्दी भाषा को एक नयी दृष्टि मिल रही है और अन्तर्राष्ट्रीय विचारधाराओं का परिप्रेक्ष्य वर्तमान हिन्दी साहित्य में पूर्णता परिलक्षित हो रहा है। हिन्दी शब्द की व्युत्पत्ति और उसके अर्थ से प्रारम्भ हुई यात्रा राष्ट्रभाषा हिन्दी की समस्याओं और समाधान पर आकर समाप्त होती है। प्रशंसनीय यह है कि डॉ. वीरेन्द्र ने समाज के उन तमाम सारे क्षेत्रों को अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से देखा है तथा उनमें हिन्दी के स्वरूप को परिलक्षित करने का प्रयास किया है जो वर्तमान में किसी न किसी रूप में हिन्दी-भाषा विकास की बात करते दिखते हैं। इन क्षेत्रों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, बैंक, इण्टरनेट, स्वैच्छिक संगठन, संचार माध्यम आदि प्रमुख हैं। इन क्षेत्रो को आधार बनाकर लिखे गये लेखों में हिन्दी की वास्तविक स्थिति को दर्शाया गया है। डॉ. वीरेन्द्र ने हिन्दी भाषा के वर्तमान स्वरूप एवं उसकी स्थिति को दर्शाने के साथ-साथ उसकी संवैधानिक स्थिति को भी प्रस्तुत किया है। इन लेखों के माध्यम से हिन्दी के प्रति संवैधानिक सोच तथा समय-समय पर गठित होते आयोगों का दृष्टिकोण आसानी से समझा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक का विवेचन करने पर यह ज्ञात होता है कि हिन्दी अपने विशेष साहित्यिक भण्डार की वजह से लोगों के जादुई आकर्षण का केन्द्र रही है और वैश्वीकरण के इस दौर में हिन्दी को नये परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की आवश्यकता है। यहाँ चाहे सूचना प्रौद्योगिकी की बात हो या उत्पाद बेचने की या वोट माँगने की, विज्ञापनों के माध्यम से वस्तु के आत्म प्रचार की या फिल्मों को लोकप्रिय बनाने की या फिर वैज्ञानिक अनुसंधान की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुँचाने की, इन सबके लिये हिन्दी अब सर्वमान्य भाषा बन गयी है क्योंकि परिवर्तन के अनुरूप, परिवेश के अनुसार स्वयं को ढालकर अभिव्यक्ति को बहुआयामी रूप प्रदान करने में हिन्दी सदैव सक्षम रही है। तेरह अध्यायों के इस संग्रह के द्वारा डॉ. वीरेन्द्र ने हिन्दी भाषा का वर्तमान स्वरूप, सत्य हमारे सामने उद्घाटित किया है। निःसंदेह यह पुस्तक ज्ञानवर्धक एवं संग्रहणीय है।