मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

भोजपुरी विमर्श-- डॉ. पुनीत बिसारिया, डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

भोजपुरी विमर्श के विविध सरोकार
डॉ. सुरेन्द्र प्रताप सिंह यादव
पुस्तक - भोजपुरी विमर्श
लेखक - डॉ. पुनीत बिसारिया, डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - निर्मल पब्लिकेशन, ।.139 गली नं. 3, कबीर नगर, शाहदरा, दिल्ली- 94
मूल्य - 225.00
पेज - 8 + 135 = 143
ISBN - 81-86400-007-9

आज जब सब कुछ नया सृजित किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर विरासत का अकस्मात विनाश भी किया जा रहा है। परन्तु इस सब के बीच कुछ सभ्रान्तजन ऐसे भी होते हैं जो अपनी संस्कृति, संस्कार एवं लोक आस्थाओं के प्रति लगाव रखते हुए उनके संरक्षण की बात सदैव करते हैं। उनमें ऐसा ही प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय कार्य लेखक द्वय डॉ. पुनीत बिसारिया एवं डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव कर रहे हैं। इन्हीं सब सरोकारों को प्रस्तुत सम्पादित पुस्तक के माध्यम से भोजपुरी भाषा के विविध पहलुओं पर गागर में सागर भरने वाली बात इक्कीस शोध पत्रों के माध्यम से कही गयी है। जैसा कि इस पुस्तक की सम्पादकीय से स्पष्ट है कि भोजपुरी विमर्श इक्कीसवीं सदी के प्रमुख सरोकारों में एक हो गया है, जिसने अब तक अपेक्षित किन्तु जन सापेक्षता की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण भोजपुरी भाषा को साहित्यिक विमर्श की परिधि से हटाकर धुरी पर ला खड़ा किया है। वास्तविकता यह है कि आज भोजपुरी के लोक साहित्य के सरोकारों पर न सिर्फ गम्भीर चर्चा हो रही है, बल्कि इसके भाषा वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक तथा साहित्यिक पक्षों को भी प्रकाश में लाने का समारम्भ हो चुका है। आज जिस प्रकार भोजपुरी फिल्मों, धारावाहिकों एवं लोकगीतों की लोकप्रियता बढ़ रही है उसने इस कर्णप्रिय जनपदीय भाषा के विविध पक्षों पर समग्र विमर्श हेतु बाध्य किया है।
अपनी सरलता तथा सीधी-सादी-भाषा के कारण भोजपुरी भाषा का व्याकरण बड़ा ही सरल है। इसमें विभिन्न प्रकार के भावों और रसों को प्रकाशित करने की अपूर्व क्षमता मिलती है। अर्थात् साहित्य नुरागियों से अब यह बात छिपी नहीं रही कि भोजपुरी साहित्य का विकास और उसकी मधुरता जगप्रसिद्ध है जो जनसाधारण को अनायास अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है।
भोजपुरी भाषा के विविध पक्षों से साक्षात्कार कराती प्रस्तुत सम्पादित पुस्तक में भोजपुरी के उद्भट विद्वानों के शोधपरक आलेखों को रखा गया है जिसमें भोजपुरी भाषा की विभिन्न प्रवृत्तियाँ लोक संस्कृति के आइने में भोजपुरी भाषा के उद्भव एवं विकास से लेकर लोक, कला, संस्कृति, नारी स्वाभिमान, राष्ट्रीय चेतना को तो दर्शाया ही गया है इसके साथ ही विदेशों में इसके प्रचार-प्रसार एवं फैलाव की भी चर्चा प्रस्तुत लेखों के माध्यम से इन विद्वान लेखकों ने की है।
भोजपुरी आन्दोलन एवं इसकी विदेशों में बढ़ती लोकप्रियता के कारण संविधान की भाषा अनुसूची में इसे शामिल करने वाली मांग को देखते हुए भोजपुरी पर पुस्तक का अभाव लम्बे समय से देखा जा रहा था, हमें उम्मीद है कि प्रस्तुत पुस्तक इस अभाव को पूरा करती नजर आयेगी।

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