बुधवार, 20 अप्रैल 2011

भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा-- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

भारतीय मुसलमान: मिथक एक यथार्थ
डॉ चन्द्रमा सिंह
पुस्तक - भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा
सम्पादक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - राधा पब्लिकेशन, 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - 750.00
पृष्ठ : 14+363=377
ISBN: 81.7487.650.2


समकालीन समाज विज्ञान एवं साहित्यिक परिदृश्य में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव का नाम किसी औपचारिक परिचय का मोहताज नहीं हैं। हालाँकि डॉ. वीरेन्द्र यादव एक सामाजिक चिंतक एवं गद्यकार के रूप में जाने जाते हैं लेकिन आपके रचनात्मक क्रियाकलाप को किसी विधा विशेष की हदबंदी में नहीं बाँधा जा सकता है। आपने सामाजिक समस्याओं एवं समसामयिक समय के अनेक ज्वलंत मुद्दों को अपनी लेखनी का मुख्य विषय बनाया है। समय एवं समाज की नब्ज को बारीक से देखने वाले डॉ. वीरेन्द्र यादव ने एक ऐसा रचना संसार निर्मित किया है जिसमें तत्कालीन युग का पूरा परिवेश ही प्रतिबिम्बित हो उठा है।
इसी संदर्भ में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की सम्पादित पुस्तक भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा को लिया जा सकता है। विश्व के सबसे बड़ा लोकतंत्र का पहरी भारत अपनी विशेषताओं के कारण अतीत में विश्व का सिरमौर माना जाता था ,वहीं यहाँ वर्तमान समय में साम्प्रदायिक सदभाव एवं भाईचारे की भावना एवं विचारधारा को लेकर आपसी खेमेबन्दी हो गयी है। लेखक की प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से यही संदेश है कि अपनी स्वार्थ सिद्ध के लिये लोग आपस में ऊँचनीच का बंटवारा कर देते है जबकि ईश्वर ने सभी प्राणियों को श्रेष्ठ एवं समान बनाया है। केवल मानव ने इसमें भेद इसलिये किये है कि वह उनसे श्रेष्ठ एवं आगे बढ़ जाए।
भारतीय मुसलमान: दशा और दिशा नामक इस सम्पादित पुस्तक में 63 विद्वानों के लेखों को समाहित किया गया है जिसमें भारत के हर प्रान्त एवं शिक्षा जगत के विभिन्न क्षेत्रों सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक क्षेत्रों से जुड़े विषय विशेषज्ञों ने अपने विचारों को निष्पक्ष भाव से रखा है। 363 पृष्ठ की इस पुस्तक में सम्पादक ने इस आलेखों, शोधपत्रों को 8 भागों में वृहत्तर मुस्लिम समाज: पुराने प्रश्न, नये परिप्रेक्ष्य, राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता एवं भारत विभाजन, मुस्लिम नारी: आज, कल, और आज, साहित्यिक परिदृश्य में मुसलमान, संगीत, कला एवं शिक्षा में मुस्लिम समाज का योगदान, मुस्लिम संस्कृति का हिन्दू संस्कृति पर प्रभाव। 21वीं सदी में मुस्लिम नेतृत्व की सीमाएं और सम्भावनायें, मुसलमान और आधुनिक दलित चिंतन नाम उपखण्डों में बाँटकर पाठकों के लिये थोड़ा आसान कार्य कर दिया है । लेखक ने अपने सम्पादकीय में स्पष्ट रूप से कहा कि इस्लाम विश्व के किसी भी धर्म की अपेक्षा अपने अन्दर अनेक विशेषतायें एवं मानववाद की अवधारणा को लेकर आया है और जितना कम समय में अत्यधिक सुदीर्घकालीन प्रचार और प्रसार भारत में इस्लाम ने किया उतना कोई अन्य आक्रमण करने वाली (आक्रान्ता-जाति) या संस्कृति ने नहीं किया, यहाँ तक कि अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में आने वाली पश्चिमी-पुर्तगाली, फ्रांसीसी, ब्रिट्रिश जातियाँ और ईसाई धर्म संस्कृति भी उतना प्रचार-प्रसार नहीं कर पायीं लेकिन उन साम्राज्यवादी शक्तियों ने हमारे समाज में भारतीयों के बीच फूट डालने के लिये प्रत्येक अवसर का लाभ उठाते हुये उन्हें दो परस्पर शत्रु खेमों में विभाजित कर दिया। पश्चिमी शक्तियों (अंग्रेजों ) की इस कुटिल पृथकतावादी मनोवृत्ति से आकर्षित होने के, वे मातृभूमि का विभाजन करके अपने लिये एक अन्य देश बनाने में सफल हो गये तथा इस समुदाय के जिन लोगों ने अपने जन्म स्थान में रहने का निर्णय किया वे ही मुस्लिम अल्पसंख्यक कहलाये।
पुस्तक के लगभग सभी लेखकों ने मुस्लिम समाज के प्रति भेदभाव एवं उनके बारे में फैले भ्रमों, गलतफहमियों, पूर्वाग्रहों एवं राष्ट्र के प्रति प्रेम को नारी की से विश्लेषण किया है। यह बात सच है कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यदि हम आज देखें तो विश्व का शायद ही ऐसा कोई कोना न होगा जहाँ मुस्लिम या इस्लाम धर्म के अनुयायी न रहते हों।
कुल मिलाकर प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय मुसलमानों के ऐतिहासिक एवं सामाजिक कार्यों को गहराई से विवेचित किया गया है, और उनके द्वारा किये गये सकारात्मक सहयोग को ,हादसों एवं घटनाओं के द्वारा लेखकों ने प्रमाणिक अमली जामा पहनाया है। प्रस्तुत पुस्तक शोध छात्रों, बुद्धिजीवियों एवं मुस्लिम समाज के बारे में जिज्ञासु विद्वानों के लिये मील का पत्थर साबित होगी ऐसा में व्यक्तिगत रूप से मानती हूँ।


1 टिप्पणी:

  1. वीरेन्द्र जी, आपकी अधिकतर पुस्तकें देखीं हैं. वाकई अपने महत्वपूर्ण कार्य किया है...साधुवाद !!

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