सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

 
  सवालों के चक्रव्यूह में शिक्षाडा0 विजय कुमार वर्मा
प्रवक्ता -समाजशास्त्र विभाग
उ0प्र0 विकलांगउद्धार डा0 शकुन्तला मिश्रा वि0वि0, मोहान रोड, लखनऊ।
   

        प्रस्तुत पुस्तक  देश के विभिन्न प्रान्तों के उच्च शिक्षा जगत से सम्बद्ध प्राध्यापकों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, दलित चिन्तकों,मनोवैज्ञानिकों एवं वैज्ञानिकों के सार्थक चिन्तन, मनन एवं गम्भीर विचारों को रखा गया है।
 इक्तीस विद्वानों एवं आठ भागों  में प्राचीन काल में शिक्षा का स्वरूप,अवधारणा एवम उन्नयन के उपाय, भारत में  शिक्षा के बदलते आयाम,(प्राथमिक,परिषदीय एवम माध्यमिक शिक्षा के विशेष परिप्रेक्ष्य में ) अंगे्रजों का  भारत में शिक्षा के प्रति दृषिटकोण, भारतीय संविधान में शिक्षा अधिकार अधिनियम : एक तातिवक विश्लेषण ,भारत में उच्च शिक्षा  : समस्याएं एवम समाधन, बदलते परिदृश्य में   महिला (स्त्री )शिक्षा के आयाम, साहित्य में शिक्षा के विविध सन्दर्भ, भारत में शिक्षा चिन्तन के विविध सरोकार बाटा गया है।
          यह कहना विवाद का विषय  हो सकता है कि आज विज्ञान से प्रोद्योगिकी  और प्रोद्योगिकी से पूंजीवाद तथा निजीकरण की स्पर्धा से मानवता का âास हो रहा है। भारतीय समाज को इस दयनीय सिथति से उबारने का कार्य उचित शिक्षा की दिशा निर्धारित किये जाने पर ही सम्भव हो सकेगा। इस दृषिट से अब समय आ गया है कि शिक्षा जगत से सम्बद्ध व्यकित एवम इससे जुड़ी संस्थाएँ गम्भीरता से चिन्तन करें कि शिक्षा की विशाल व्यवस्था को समग्र संसार से बाहरी रूप में संवाद करने तथा इससे संलग्न समाज के साथ अन्तर्सम्बन्ध बनाये रखते हुये उनका सहज विकास कैसे किया जाये ? वर्तमान में शिक्षा के इस मूल प्रश्नों एवं दर्शन को प्राय: विश्व के सभी समाजों ने यथासम्भव स्वीकार किया है जिसके फलस्वरूप प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा का विस्तार एवं प्रसार सम्भव हो सका है। यहा एक तथ्यएवं सत्य यह भी है कि शिक्षा के विस्तार व प्रसार की विशद प्रक्रिया में समय-समय पर शिक्षाविदों द्वारा विचार विनिमय भी किया गया है एवं इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं पर चर्चा के साथ-साथ भविष्य के लिये कार्ययोजना की अनुशंसायें भी की गयीं परन्तु इस यक्ष प्रश्न से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज भी उचित शिक्षा की दशा के अनुरूप इसकी दिशा निशिचत नहीं हो पार्इ है।
   वर्तमान सन्दर्भों की बात की जाय तो वैश्वीकरण की प्रकि्रया में उत्पन्न चुनौतियों से शिक्षा भी अछूती नहीं रही। वैश्वीकरण के इस दौर में शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हो रहे हैं। हमारी भारतीय उच्च शिक्षा अभी तक प्रसार की समस्या से जूझ रही थी कि संख्यात्मक शिक्षा  का स्थान  गुणात्मक शिक्षा ने ले लिया। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज और भौगोलिक दृषिट से इतने बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र में गुणवत्ता प्राप्त करना आज शिक्षा का महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है।
     वर्तमान में भारत में शिक्षा के क्षेत्र में मुख्य चर्चा का विषय उच्च शिक्षा की भूमिका बन गया है। विश्वविधालयों, महाविधालयों तकनीकी संस्थानों ( प्रबन्ध संस्थानों ) और अन्य व्यवसायिक संस्थानों का पाठयक्रम, अधोसंरचना, शिक्षण पद्धति परीक्षा पद्धतिमूल्यांकन, प्रशासन और प्रवेश प्रकि्रया के स्तर और मापदण्डों के मूल्यांकन और समीक्षा का दौर चल रहा है। जिस श्रृंखला में अनेक परिषदोंनिकायों का गठन किया गया है। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि पशिचमी राष्ट्रों की उच्च शिक्षा पद्धति का अंधानुकरण किया जाय अथवा भारतीय समाज की आवश्यकताओं और परिसिथतियों के अनुसार मापदण्ड निर्धारित किये जायें। इस पर सभी बुद्धिजीवियों के समीक्षात्मक, प्रगतिशील तथा वैज्ञानिक तर्कों से युक्त विचारों को इस पुस्तक में रखा गया है।
         इस पुस्तक के सम्पादन के पीछे हमारी मुख्य भावना यह रही है कि इसके माध्यम से शिक्षा से सम्बनिधत अनेेक वैचारिक अवधारणाओं की अनसुलझी गुतिथयों को बेबाक तरह से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। जिससे जनसामान्य में चेतना जागृत करना है। इसके तहत यह  भी उददेश्य  कहीं न कहीं निहित है कि वे अपना विकास किसी शकित के ऊपर न मानकर स्वयं अपने स्तर पर करें तभी उनका हित हो सकता है।
मेरा ऐसा विचार है कि प्रस्तुत पुस्तक न केवल संविधान विशेषज्ञों, विधिशोधार्थियों, विधिवेत्ताओं, विधि व्याख्याताओं, प्राध्यापकों, राजनीतिक एवं सामाजिक चिंतकों बलिक आम नागरिक के लिए भी उपयोगी एवं प्रेरणादायक सिद्ध होगी।
पुस्तक -   सवालों के चक्रव्यूह में शिक्षा
लेखक -   डा. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक -   ओमेगा पबिलकेशन्स 43734 बी., जी. 4, जे.
    एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नर्इ दिल्ली
मूल्य -    795.00,सं.2011
पेज -     14 + 312 - 326
ISSN -    978-81-8455-289-8

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