शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

भारतीय संस्कृति : कल, आज और कल

      भारतीय संस्कृति : कल, आज और कल
             डा0 अभिलाष सिंह
प्रवक्ता, राजनीति शास्त्र,महामाया राजकीय महाविद्यालय
          धनूपुर, हणिडया, इलाहाबाद
             डा0 वीरेंद्र सिंह यादव एवं डा0 रावेन्द्र कुमार साहू के कुशल संपादन में संपादित पुस्तक भारतीय संस्कृति :कल,आज और कल में संस्कृति की परम्परागत स्थापनाएं तो हैं ही इसके साथ ही बाजारवादी व्यवस्था का भारतीय संस्कृति पर पढ़ने वाले प्रभावों का जिक्र भी प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से विवेचित विश्लेषित करने की कोशिश की गर्इ है। संपाद्वय ने संस्कृति के माध्यम से अपना भी दृषिटकोण रखा है। बत्तीस विद्वानों के छह उपशीर्षकों के अन्तर्गत, संस्कृति :परम्परा की प्रासंगिकता एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य, संस्कृति : भूमण्डलीकरण, बाजारवाद एवं उत्तर-आधुनिक विमर्श, साहित्य, संस्कृति और समाज :एक अनुशीलन, लोक की संस्कृति या संस्कृति  का लोक, संस्कृति में पर्यावरणीय चेतना के बीज बिन्दु,संस्कृति का बाजार और बाजार की संस्कृति :चिन्ता-चिन्तन के विविध पहलू आदि के अंतर्गत इसका विभाजन किया गया है।
    सम्पादक द्वय की मान्यता है कि  भारत विभिन्न गंगा-जमुनी संस्कृतियों  का विशाल संगम स्थल रहा है। जिस तरह इस देश का गौरवशाली अतीत रहा है उसी तरह यहाँ विभिन्न संस्कृतियों की अजस्र धारा अविरल प्रवाहित होती रही है। संस्कृतियों की गौरवशाली परम्परा की तरह उसके चिन्तन- मनन की भी त्रिवेणी सतत प्रवाहित होती रही है। चिन्तन की यह परम्परा एक तरफ 'दिनकर ,'दामोदरन तथा 'राहुल सांकृत्यायन से लेकर 'भदन्त आनन्द कौसल्यायन तक  अपनी छठा बिखेरती  है वहीं दूसरी तरफ 'पूरनचन्द्र जोशी से लेकर  से लेकर 'सूरज बड़ाजत्या तक अपने अपने आधुनिक रूप में रूपहले पर्दे पर भारतीय संस्कृति के खुशनुमा वातावरण  को गुंजायमान करती है। हमारे राजनीतिक वर्ग ने भी  इस  सांस्कृतिक चिंतन को आगे बढ़ाने में अपना महती योगदान दिया है । इसकी अग्रणी पंकित में 'राधाकृष्णन एवं 'आचार्य नरेन्द्रदेव का नाम आता है। इन सब  महापुरूषों ने अपने-अपने ढंग से संस्कृति की सरिता में गोते लगाकर मनमानस का मार्ग दर्शन करने का सार्थक प्रयत्न किया है।
  वर्तमान  की यदि बात की जाए तो यह उत्तर-आधुनिक ,भूमण्डलीकरण  एवं बाजारवादी संस्कृति  का युग है जिसमें अपना कुछ नहीं है वरन जो कुछ अपना है वही सबका है। आज के इस सांस्कृतिक क्षरण के युग में 'रीति और 'सदाचार जैसे शब्दों का विलोप होता जा रहा है जिससे मनुष्य के जीवन में परिवर्तन भी तीव्र गति से प्रारंभ हुए हैं। इस परिवर्तन की आँधी ने सांस्कृतिक संक्रमण एवं जीवन मूल्यों का क्षरण शुरू कर दिया है  परिणामस्वरूप जन सामान्य के  जीवन मूल्यों में भी बदलाव आना स्वाभाविक है। अनेक विद्वानों में से एक का मानना है कि-''भूमण्डलीकरण शब्द बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में अधिक प्रचलन में आया; जब सोवियत संघ एवं बर्लिन की दीवार के विघटन के उपरान्त मुक्त अर्थव्यवस्था एवं वल्र्ड वाइड वेब ने राष्ट्रीय सीमाओं को संकुचित करते हुए दुनिया को वास्तविकता के धरातल पर एक वैशिवक गाँव में तब्दील कर दिया। तकनीकी सूक्ष्मता, सूचना क्रांनित एवं खुले बाजार ने वैशिवक गतिशीलता का ऐसा विस्तार किया कि इसका व्यापक प्रभाव न केवल आर्थिक धरातल पर बलिक राजनैतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक,धार्मिक आदि सभी पटलों पर स्पष्ट रूप से दिखार्इ देने लगा। समकालीन सिथति में भूमण्डलीकरण देश एवं काल के अप्रत्याशित संकुचन के रूप में परिभाषित किया जाता है जो वैशिवक स्तर पर सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक अन्तर्संबंध एवं अन्तर्निर्भरता की व्यापक घनीभूतता को अभिव्यक्त करती नजर आती है।
        पुस्तक का निष्कर्ष है कि वर्तमान में यह विमर्श का प्रश्न एवं  अति महत्वपूर्ण बात हो सकती है कि अत्यधिक आर्थिक असमानता वाले देश में संस्कृति की परम्परा को सुरक्षित रख पाना कितना स्वाभाविक और कितना कृत्रिम है ? जहा साधनों की पवित्रता खत्म हो रही हो और साध्य ही को अनितम माना जा रहा हो और यह साध्य भी मात्र अधिक से अधिक पैसा-रूपयों को एकत्र करना हो तो इन सिथतियों को मददेनजर रखते हुए यदि किसी भी समाज में अर्थशकित सर्वोत्तम उपलबिध और सर्वोत्तम योग्यता का मापदण्ड बन जाये तो संस्कृति, सरोकार,मूल्य एवं संस्कारों की बात करना इस बाजारवादी युग में नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसा ही क्या प्रतीत नही होगा ? 
         प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय संस्कृति पर शोध आलेख प्रसंगानुसार तुलनात्मक प्रसंग विशेष आकर्षण के केन्द्र बन गए हैं। इसके साथ ही लेखकों की मानसिक इंदू की सिथति भी पुस्तक में जहाँ-तहाँ देखने को मिलती है। विस्तृत सोच के साथ दीर्घ का समावेश और संरक्षण इस पुस्तक की विशालतम उपलबिध है जिसे कम से कम सहेजा तो जा ही सकता है।
   पुस्तक का नाम- भारतीय संस्कृति :कल, आज और कल,संपादक-डा0वीरेन्द्रसिंह यादव, डा0 रावेन्द्र कुमार साहू
पेज-19+331-350,ISSN .978.93.81630.00.6
संस्करण-प्रथम.2012,मूल्य-895.00पैसिफिकपबिलकेशन्स-एन.187शिवाजीचौक, सादतपुर एक्सटेंशन,दिल्ली-110094

 

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