शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भारत में शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियाँ

         भारत में  शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियाँ
डा0 विजय कुमार वर्मा
प्रवक्ता -समाजशास्त्र विभाग
0प्र0 विकलांगउद्धार डा0 शकुन्तला मिश्रा वि0वि0] मोहान रोड, लखनऊ।

               आज तीव्रगति से विशेषकर तकनीकी एवं उच्च शिक्षा में हो रहे निजीकरण से अध्यापकों एवं छात्रों के शोषण में वृद्धि हुर्इ है, प्रवेश सम्बन्धी अनियमितताओं आदि के कारण उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लोकतंत्रवादी समानता आहत हो रही हैं जिससे नि:संदेह गुणात्मकता प्रभावित हो रही है। अत: शिक्षा के निजीकरण को नियंत्रित करते हुये स्ववित्त पोषित संस्थाओं के अंधाधुंध अनुमोदन को सीमित करने पर भी सरकार  को शिí के साथ विचार कर इसमें अंकुश लगाना होगा। डा.वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा संपादित इस पुस्तक के द्वारा शिक्षा से सम्बनिधत विभिन्न सरोकारों को रेखांकित करने की कोशिश की है।

       वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पड़ी करते हुए सम्पादकीय में डा. वीरेन्द्र सिंह यादव ने लिखा है कि इसमें कोर्इ दो राय नहीं कि दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी विशेषकर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्à लगाती है। 180 मिनट में लिखी गयी सम्पूर्ण उत्तर पुसितका का मूल्यांकन 3-4मिनट में हो जाता है जो आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ हास्यास्पद भी है। इसके लिये हमारा व्यकितगत सुझाव है कि वर्ष भर की विधार्थी की मेहनत को कुछ मिनटों में न मूल्यांकित करके वर्ष भर उनका सतत मूल्यांकन किया जाये। उपरोक्त पुस्तक नौ उपशीर्षकों -परम्परागत शिक्षा का स्वरूप,अवधारणा एवम विकास प्रकि्रया,  भारत में  शिक्षा के बदलते आयाम (प्राथमिक, परिषदीय एवम माध्यमिक शिक्षा के विशेष परिप्रेक्ष्य में), भारत में शिक्षा के प्रति अंगे्रजों का दृषिटकोण,भारतीय संविधान में शिक्षा अधिकार अधिनियम : एक तात्वविक  विश्लेषण , भारत में उच्च शिक्षा  : समस्याएं एवम समाधन, भारत में  महिला (स्त्री) शिक्षा के बदलते आयाम,शिक्षा में अग्रज एवं अनुज पीढी़ का योगदान,बदलते परिदृश्य में में शिक्षा चिन्तन के विविध सरोकार, आधुनिक  भारत में शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियां में विभाजित है। जो शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य की हकीकत को व्यक्त करती है।

           इसमें कोर्इ दो राय नहीं कि भारतीय समाज अनेक जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र एवं वगो± में विभक्त है एवं ऐसे सभी समूहों को एक सूत्र में पिरोने में उच्च शिक्षा एक प्रभावशाली माध्यम है। ज्ञान आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2015 तक उच्च शिक्षा के लिये भारत को 1500विश्वविधालयों की आवश्यकता होगी जो वर्तमान में मौजूद लगभग 350 विश्वविधालयों से लगभग तीन गुना अधिक है। इसी प्रकार 50 राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों   की आवश्यकता होगी जो उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान कर सकें। लेकिन वहीं दूसरी ओर यह चिन्ता एवं अफसोस की बात है कि भारत में गणतंत्र के 64 वषो± बाद भी देश में उच्च शिक्षा में अध्ययनरत छात्रों की संख्या मात्र कुछ ही करोड़ के आस-पास ही है यानि कुल जनसंख्या का केवल 5-6  प्रतिशत हिस्सा ही हमारे यहाँ उच्च शिक्षित वर्ग में आता है जबकि विकसित देशों में यह 20 प्रतिशत के आसपास है।
        पुस्तक की मान्यता है कि  चाहे बुनियादी शिक्षा प्राथमिक की बात हो या आधार शिक्षा माध्यमिक या फिर तकनीकी शिक्षा की बात हो या फिर उच्च शिक्षा की बात हम आखिर वैशिवक परिप्रेक्ष्य की तुलना में क्यों पिछड़ते जा रहे हैं; शिक्षा के मदिंरों में आज व्यवसायिकता एवं माफियावाद क्यों हावी हो रहा है? फिर सरकार एवं समाज के आम बुद्धिजीवियों के द्वारा बार-बार गुणवत्ता की बात कर प्रश्न चिन्à खड़े करना कहाँ तक उचित अनुचित है?
         हमें उम्मीद है कि शिक्षित युवा ही नहीं बलिक शिक्षा जगत से सम्बद्ध ,विद्वतजनों व समाज के प्रबुद्ध नागरिकों को  शिक्षा जैसे ज्वलंत विषय पर  इन  तितालीस विद्वानों के बहुमूल्य एवं सारगर्भित विचार अवश्य पसंद आएगें ।

 पुस्तक का नाम- भारत में  शिक्षा के उभरते क्षितिज और गहराती चुनौतियाँ   संपादक-डा.वीरेन्द्रसिंह यादव
पेज-16&360¾376
ISSN.978-81-8455-292-8
संस्करण-प्रथम.2011-मूल्य-795-00
ओमेगापबिलकेशन्स-43784ठएळ4एजे.एम.डी.हाउस,मुरारी लाल स्ट्रीट,अंसारी रोड, दरियागंज, नर्इ दिल्ली-110002


 

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