शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

आज का भारत : कुछ अहम सवाल कुछ बुनियादी समस्याएँ

 आज का भारत : कुछ अहम सवाल कुछ बुनियादी समस्याएँ
                                                             
           समीक्षक-अतुल कुमार मिश्र
                                       प्रवक्ता, शिक्षक-शिक्षा विभाग, तिलक महाविधालय, औरैया
       औधोगीकरण, नगरीकरण और वैज्ञानिक अन्वेषणों के पाश्र्व में खड़ा जीवन बाहर से ही नहीं, भीतर से भी बदला है। आजादी ने हमें जितना दिया है, उससे अधिक हम से ले भी लिया है। सामान्य मनुष्य तो अभी भी आजादी को टोह रहा है। आजादी राष्ट्रीय स्तर पर जितनी अहम उपलबिधयाँ लेकर आर्इ है, वैयकितक स्तर पर उतना और वैसा कुछ भी नहीं हस्तगत हुआ है। ''व्यकित की मनोव्यथा बढ़ी है क्योंकि महानगरों में भीड़ बढ़ी है। मनुष्य पहले से अधिक अकेला हुआ है क्योंकि उसे असितत्व नहीं मिला है। उसकी ऊब दुगुनी हुर्इ है क्योंकि मानवीय सम्बन्ध बिखर गये हैं। मनुष्य बेरोजगार होता जा रहा है क्योंकि गाँव और नगर पीढि़याँ उगल रहे हैं। निराशा का रंग दिन-प्रतिदिन गाढ़ा होता जा रहा है क्योंकि मनुष्य की सिथति अनपहचान सी होती जा रही है। महानगरों में भीड़ का दबाव बढ़ा है तो उसी अनुपात में जीवन यांत्रिक और एकरस होता जा रहा है। नतीजा यह है कि छोटे नगरों में जीवन का अभाव और विषम परिसिथतियाँ इतनी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं कि व्यकित के मन में 'एलियनेशन और 'बोरडम की भावना ने डेरा सा डाल लिया है।
        संपादक के रूप  में समय-समय पर विभिन्न प्रयोग करने वाले डा0 वीरेन्द्रसिंह यादव  द्वारा संपादित  इस पुस्तक में आज के भारत की महत्वपूर्ण समस्याओं पर अनेक सवाल उठाए गये हैं। इस पुस्तक में चवालीस अध्याय एवं ग्यारह खण्ड हंै। जो इस प्रकार हैं-ज्वलंत प्रश्न एवं सुलगते सवाल, राष्ट्रीय असिमता के प्रश्न ,आधी दुनिया का यथार्थ, बहुजन समाज का स्याह यथार्थ, एक दुनिया और भी है, चिन्तन-चिन्ता , इतिहास दृषिट , विकास और जनसंचार माध्यम, भारत में उधोग एवं अर्थव्यवस्था की सिथति, बीच बहस में ,शिक्षा एवं संगीत की सिथति, भाषा एवं साहित्य का समकालीन परिदृश्य जैसे प्रमुख बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया हैं।
        पुस्तक में अधिकतर विद्वानों की मान्यता है कि आज का आदमी अपने आसपास के अनेक सवालों से टकराता, टूटता और निर्वासित हो रहा है क्योंकि मनुष्य वैज्ञानिक उपलबिधयों को अपने जीवन में जाने-अनजाने स्वीकार कर रहा है और वैज्ञानिक विचारधारा ही आधुनिकता की धारणा बन गर्इ है। अत: आधुनिकता ने वार्तालाप के दायरे को नितांत सीमित और संकुचित कर दिया है। व्यकित अकेलेपन से निकलने और परिवेश से जुड़ने के लिये छटपटा रहा है। वह जीने के लिये नये सम्बन्धों और नयी मान्यताओं की तलाश करता है ताकि अपनी खोर्इ हुर्इ दिशा को प्रकाशित कर सके और जीवन को नये सम्बन्धों और सन्दभो± से जोड़ सके।
       इन्ही निराशाओं के बीच आशा की एक किरण भी संपादक को नजर आती है। सम्पादकीय में डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव का मानना है कि इसमें कोर्इ दो राय नहीं कि उन्नीसवीं सदी बि्रटिश साम्राज्य के वर्चस्व की थी और बीसवीं सदी अमेरिका के वर्चस्व की थी जबकि इक्कीसवीं सदी निशिचत तौर पर भारत के नाम होने जा रही है। हालांकि इससे सहमत होना मुमकिन नहीं है लेकिन हकीकत यही है कि इक्कीसवीं सदी दुनिया भर में भ्रष्टाचार के दबदबे वाली सदी साबित होने वाली है। भारतीय परिपे्रक्ष्य में तो हालत काबू से बाहर होते जा रहे हैं। क्योंकि लोकतंत्र की स्थापना से लेकर अब तक अनेक घोटाले चर्चा में आये, कर्इ बार जाँच हुर्इ, लेकिन कभी किसी को ऐसी सजा नहीं मिली जिसकी भयावहता से और लोग सबक सीखें। यह चौंकाने वाली बात भले ही हो सकती है कि देश में 800 सांसदों की संपतित का ब्यौरा अघोषित तौर पर एक हजार करोड़ रुपये से अधिक है। प्रति सांसद यह औसत एक करोड़ रूपये से अधिक का है। आखिर कहाँ से आया इतना पैसा? इसकी जाँच क्यों नहीं हुर्इ? फिर इसे अब कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसके साथ ही उच्च प्रशासनिक पदों की सेवाओं में वर्षों में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ा है। पर यह युनकर हैरानी भी नहीं हो सकती है क्योंकि अब यह व्यवस्था का यह एक अंग हो गया है। लेखक का मानना है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए आज कठोर कदम उठाये जाने की जरूरत है। तभी कुछ हम विकास की दौड़ में आगे बढ़ सकते हैं।
            इन्हीं व्यापक दृषिटकोणों को लेकर प्रस्तुत पुस्तक आज के भारत की ज्वलंत समस्याओं को लेकर केनिद्रत है। एक सम्पादक के रूप में सुप्रतिषिठत लेखक डा0 वीरेन्द्र सिंह का यह सदैव प्रयास रहा है कि समाज में घटित होने वाली समस्याओं को पैनी नजर से अवलोकित कर उनका समाधान निकाला जाए।
           प्रस्तुत  सम्पादित पुस्तक मे देश के विभिन्न प्रान्तों के उच्च शिक्षा जगत से सम्बद्ध प्राध्यापकों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों तथा साहित्यकारों के सार्थक चिन्तन, मनन एवं गम्भीर विचारों को रखा गया है । बदलते परिदृश्य में इसी को मददेनजर रखते हुये समकालीन समस्याओं से सम्बनिधत मुददों को वस्तुपरकता एवं विषयपरकता की दृषिट से डा0 वीरेन्द्रसिंह यादव की इस सम्पादित पुस्तक में  प्रकाश डाला गया है। नि:संदेह इस पुस्तक के सभी लेख अपने सहज विचारोत्तेजक यथार्थ की जीवन्त और बुद्धि संगत प्रस्तुति के कारण पठनीय और मननीय है।

पुस्तक का नाम- आज का भारत : कुछ अहम सवाल कुछ बुनियादी समस्याएँ
संपादक- डा0 वीरेन्द्रसिंह यादव
पेज-12+351-363
ISSN.978.93.80147.82.6
संस्करण-प्रथम.2011,मूल्य-995.00
पैसिफिक पबिलकेशन्स-एन.187 शिवाजी चौक, सादतपुर एक्सटेंशन,दिल्ली-110094

 

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