रविवार, 24 फ़रवरी 2013

शताब्दी की दहलीज पर भारतीय सिनेमा

शताब्दी की दहलीज पर भारतीय सिनेमा
संघर्ष और मुक्ति  के नये क्षितिज
रामबाबू गौतम,
 220,व्हीलर स्ट्रीट क्लीफसाइट पार्क ,वुऊ  जर्सी-07010
     


 लेखक एवं कला मर्मज्ञ डा0 वीरेन्द्र यादव का मानना है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है। मानव-मन को सुख, दुख, क्रोध, करूणा, भय, विभ्रम, विलास आदि की मार्मिक अनुभूति होती है तो सहसा ही वह इन अनुभूतियों से प्रेरित होकर मनोभावों को प्रकट करता है। वह जब भाव सम्पृक्त होकर मस्त झूमने लगता है तो उसी दशा में उसके बहिनिर्गत छलकते हुये भाव सहसा प्रदर्शित हो जाते हैं उन्हीं प्रकटित भावों का स्वरूप सिनेमा में देखने को मिलता है, जिससे दर्शक भी रोमांचित हो जाते हैं। इस रूप में हम पाते हैं कि सिनेमा के माध्यम से हमारे मूल्यों  का अनवरत प्रवाह सम्भव है। हिन्दी सिनेमा के विकास की एक लम्बी परम्परा है, जिसे मात्र कुछ पृष्ठों में बांध पाना असम्भव सा है परन्तु समकालीन परिवेश में सिनेमा की उपयोगिता इतनी अधिक बढ़ गयी है कि आज उसको मानव-जीवन से भिन्न नहीं किया जा सकता है। हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जन-जन तक पहुचाने का सक्षम साधन सिनेमा ही है। नि:संदेह सिनेमा आज भूमंडलीकरण के युग में भी अपनी अहम भूमिका अदा कर रहा है। फिल्मों के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रकाशित किया जा रहा है। इसलिए यदि सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाये तो कोर्इ अतिशयोकित नहीं होगी। हिन्दी सिनेमा की लोकप्रियता का कारण भाषागत विशेषताएं भी हैं। हिन्दी सरल, सुबोध व लालित्यपूर्ण भाषा है, जिसके माध्यम से भावों की अभिव्यकित सहजता से हो जाती है। यही कारण है कि अन्य भाषाओं की अपेक्षा हिन्दी सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ रही है। 
            पुस्तक की मान्यता है कि मूक अभिनय से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा अब सैटेलाइट से देश भर के सभी डिजीटल सिनेमाघरों में पहुँच गया है। आज हीरो ही नहीं हीरोइन भी नंबर वन हैं। करीना कपूर, कैटरीना कैफ, विधाबालन, प्रियंका चोपड़ा, कंगना रानावत, रानी मुखर्जी की फिल्में जबरदस्त हिट होकर एक-एक फिल्म करोड़ो का व्यवसाय कर रही हैं। जहाँ सन 2011र्इ0में बाड़ीगार्ड, रावन, जिंदगी न मिलेगी दोबारा, मेरे ब्रदर की दुल्हन, नो वन किल्ड जेसिका, सात खून माफ, डान-2, आदि व्यावसायिक सफल फिल्में आर्इं। वहीं सन 2012र्इ0 की प्रमुख फिल्में जो आ चुकी हैं या आने को हैं कृष-2, सन आफ सरदार, हीरोइन, टाइटेनिक 3डी, अगिनपथ, धूम-3, एक था टाइगर, एक मैं और एक तू, फरारी की सवारी, बोल बच्चन। निशिचत ही ये फिल्में सन 2012र्इ0 के सिनेमाघरों में एक नयी मिसाल कायम कर रहीं हैं।
           अनेक प्रश्नों से रूबरू कराती यह पुस्तक नर्इ-नर्इ जानकारियाँ भी उपलब्ध कराती है कि प्रश्न यह उठता है कि क्या सिनेमा का दूषित प्रभाव ही समाज अथवा संस्कृति पर पड़ता है? जिस प्रकार यह संसार स्वयं में न खराब है, न अच्छा है बलिक असली बात तो यह है कि हम उसे किस प्रकार से देखते हैं। हमारी विचार पद्धति और जीवन मूल्यों के अनुरूप हमारी जीवन शैली भिन्न-भिन्न प्रकार की हो जाती है। ठीक यही बात सिनेमा पर भी लागू होती है क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं- अच्छा और बुरा, अब हम उसमें से अच्छार्इ को आत्मसात करते हैं या मात्र बुरार्इ को ही ग्रहण करते हैं यह हमारे विवेक पर ही निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर फिल्म 'मुन्ना भार्इ एम.बी.बी.एस. ने जहाँ गाँधीगीरी दिखार्इ, वहीं आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों व टेक्नोलाजी के माध्यम से उसका दुरुपयोग कर छात्रों को परीक्षा में नकल करने का एक आसान रास्ता दिखाकर गुमराह भी किया। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसके किस पक्ष को कितना और कैसे आत्मसात करते हैं।
             एक सुझाव के रूप में सम्पादकीय में डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने कहा है कि आज के सन्दर्भ में यह अनिवार्य हो गया है कि फिल्म निर्माता अपने सामाजिक दायित्वों का र्इमानदारी से निर्वाहन करें क्योंकि फिल्म समाज का आइना है। फिल्म निर्माण एक कलात्मक अभिव्यकित है जो दर्शकों को प्रभावित करने के साथ उनके मनो मसितष्क और भावनाओं पर कब्जा जमाती है। इस प्रकार यह महत्वपूर्ण है कि एक निर्माता का समाज के प्रति महत्वपूर्ण दायित्व बनता है। ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि फिल्मों में मनोरंजन के साथ यथार्थ का भी ऐसा चित्रण हो कि फिल्में सामाजिक सरोकार से वास्ता रखते हुये बनें। आज के समय में जहाँ संस्कार और सभ्यता को लोग गुजरे जमाने की चीज मान रहे हैं , वहाँ निर्माता को एक आदर्श फिल्म बनाने में भय महसूस होता है कि उनका व्यवसाय डावाडोल न हो जाये। इन्हीं कुछ समस्याओं,जानकारियों और सुझावों को दर्शाते हुद इसमें अनेक नवीन जानकारियाँ दी गर्इ हैं। प्रस्तुत पुस्तक 19 विद्वानों के  लेखों  एवं पाच खण्डों में विभाजित है। जो इस प्रकार हैं। हिन्दी सिनेमा की ऐतिहासिक विकास यात्रा :एक मूल्यांकन, निर्माता, निर्देषकों  से फिल्म समीक्षकों से बातचीत के अंष एवं फिल्म समीक्षाएं, सिनेमा का यथार्थवादी स्वरूप :सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक  सरोकार का व्यवसायिक त्रिकोण, फिल्म एवं मीडिया : सम्बन्धों के बदलते सन्दर्भ, हिन्दी सिनेमा की विकास यात्रा के विविध सन्दर्भ ।
       ज्ञानवर्धन, उपयोगी एवं जनसामान्य की समझ लायक बनाने के लिए इस सम्पादित पुस्तक में अनेक विद्वतजनों के विचारों का सहारा लिया गया है। कला से प्रेम करने वालो को यह पुस्तक अवश्य पसंद आयेगी।
पुस्तक -     शताब्दी की दहलीज पर भारतीय सिनेमा संघर्ष और मुकित के नये क्षितिज
लेखक -   डा. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक -   ओमेगा पबिलकेशन्स 43734 बी., जी. 4, जे.
    एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंंज, नर्इ दिल्ली
मूल्य -    695.00
पेज -     30 + 242 - 272
ISSN -    978-81-8455-397-0
 

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