शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

आदिवासी विमर्श :  स्वस्थ जनतांत्रिक मूल्यों की तलाश
 डा0 हेमा देवरानी
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
बाबूराम शोभाराम कला महा., अलवर, राजस्थान


पुस्तक का नाम- आदिवासी विमर्श :  स्वस्थ जनतांत्रिक मूल्यों की तलाश
संपादक- डा0 वीरेन्द्रसिंह यादव एवं डा0 रावेन्द्र कुमार साहू
पेज-18+494-512
प्ैठछ.978.93.816300.37
संस्करण-प्रथम.2011,मूल्य-1200.00
पैसिफिक पबिलकेशन्स-एन.187 शिवाजी चौक, सादतपुर एक्सटेंशन, दिल्ली-110094
       
          लेखक किसी समाज का चारण ही पहीं बलिक संदेश देने वाला होता है। अपनी लेखनी द्वारा वह श्रेष्ठ व नैतिक समाज का निर्माण करता है, इस दृषिट से समय-समय पर सामाजिक समस्याओं को अपनी लेखनी के माध्यम से डा0 वीरेन्द्र ऐसे मुददों को उठाते रहते है जो अति संवेदनशील होते हैं इसी तरह का यह संयुक्त प्रयास डा0 वीरेन्द्रसिंह यादव एवं डा0 रावेन्द्र कुमार साहू के कुशल संपादन में संपादित पुस्तक 29 अध्यायों में एवं पाँच में विभाजित किया गया है। आदिवासी विमर्श : परिभाषा,पृष्ठभूमि एवं  परिवर्तन के निकष,आदिवासी साहित्य में परिवर्तन की दिशाएं एवं चिन्तन के विविध धरातल, आदिवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक सिथति : विमर्श के  विविध स्वरूप,भारत के विभिन्न, अंचलों में आदिवासी समुदाय की सिथति : दशा एवं दिशा, सामाजिक परिवर्तन की दिशा तय करता वर्तमान  का आदिवासी विमर्श : चिन्तन-चिन्तन के विविध सरोकार आदि के विविध पहलूओं को रखा गया है।
                 साहित्य जगत में पिछले तीन-चार दशकों से 'दलित विमर्श की ही तरह आदिवासी  जनजातीय विमर्श को गति प्रदान करने का स्तुत्य प्रयास किया जा रहा है। यदि हम अतीत में जाते हैं तो पाते हैं कि इसका मूल वेदों में निहित है और भारत में आयार्ं के आगमन के साथ ही अनार्यों का भी उल्लेख है। वस्तुत: अनार्य ही ' आदिवासी हैं, जिन्हें हम ' दूसरे लोग 'वनवासी, गिरिजन, या 'जनजाति नामों से अभिहित करते हैं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में जहाँ यह भील, कोल किरात एवं निषाद के रूप में चिàति हैं वहीं अंग्रेजों के आगमन के बाद हम इन्हें 'नेटिव व 'ट्राइब के रूप में भी जानते हैं। भारतीय संविधान में इन्हें 'जनजाति के रूप में पहचान प्रदान की गयी है।
           पुस्तक की मान्यता है कि 'आदिवासी शब्द का उल्लेख होने पर आम लोगों की धारणा बनती है कि वह जाहिल, गँवार, अनपढ़, असभ्य, आदिम, खानाबदोस एवं क्रूर हैं। आजकल तो यदा-कदा 'नक्सली के रूप में इनकी पहचान बताकर सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचारित किया जाता है। वास्तव में सच यह है कि अदिवासी हमारी ही तरह प्रकृति के अनुपम उपहार हंै, वह हमारे ही समाज के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अंग हंै। वह तथाकथित सभ्य कहे जाने वाली जातियों से अधिक सभ्य हैं। आदिवासी समाज में देश-प्रेम ,जाति-प्रेम और संस्कृति प्रेम कूटकर-कूटकर भरा होता है । इतिहास साक्षी है कि  अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए और अपनी स्वाधीनता के लिए इस समाज ने अनेक युद्ध किए हैं । छल,कपट से दूर,सीधे,सरल स्वभाव से ओतप्रोत एवं आपस में भार्इ-चारे की भावना  तथा अपनेपन की भावना से  ये सम्प्रक्त रहते हैं । आदिवासी समाज आज भी प्रकृति के उपादानों यथा-'जल, जंगल, जमीन की असिमता के लिए प्रण-प्राण से न्यौछावर हैं। सांस्कृतिक सभ्यता उनकी अनमोल धरोहर है और उनकी भाषा में उनका जीवन बसता है। इस प्रकार आदिवासी कहने से एक ऐसे परिवार या समूह का बोध होता है, जिसकी स्वयं की भाषा, संस्कृति एवं एक सुनिशिचत भू-भाग होता है, जिसमें वे परम्परागत विधि-विधानों से परिपूर्ण 'स्वतंत्र सुरक्षात्मक संगठन के जरिये अपने समाज का संचालन करने में समर्थ होते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि वैश्वीकरण की आँधी में उड़ने से इन्हें बचाया जाय एवं  उनकी रीति-नीति को ध्यान में रखकर उन्हें समाज की मुख्य-धारा से जोड़ने का प्रयास किया जाय।
            इस पुस्तक में ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है जो पाठकों को चकित पर देने वाला है वह यह कि ज्यादातर लोग आदिवासियों को दलित मानने की भूल कर बैठते हैं जबकि दोनों अलग-अलग हैं। अधिकतर दलित जहाँ  हिन्दू समाज के अंग माने जाते हंै और हिन्दुआें की भाषा एवं संस्कृति ही उनकी भाषा एवं संस्कृति है जबकि आदिवासी परम्परागत हिन्दू समाज से दूर जंगलों में 'संगठनात्मक तरीके से अपनी भाषा एवं संस्कृति में जीते एवं बसते हंै तथा उनमें अभी दलितों की तरह जाति का रोग नहीं लगा है, कहना चाहिए कि दलितों की तुलना में आदिवासी समाज की दुनिया अभी बंद एवं सीमित है तथा वह साहित्य से ज्यादा अपनी संस्कृति के प्रति सजग हंै।
          कुल मिलाकर डा0 वीरेन्द्रसिंह यादव इस पुस्तक के माध्यम से अपने विजन को सम्पादकीय में विषय वस्तु की दृषिट से बिल्कुल स्पष्ट करते नजर आते हैं। नि:संदेह डा0 वीरेन्द्रािंह यादव ऐसे लेखक है जो हाशिए के समाज की संवेदनशीलता की वकालत करते हैं। और इस पुस्तक की विशेषता है कि यह उच्चकोटि की विषयवस्तु की उपलब्धता के साथ ही आदिवासी समाज में देश-प्रेम की समझ को दो टूक शब्दों में व्यक्त भी करती है। प्राध्यापकों, शोध-छात्रों एवं जिज्ञासु पाठकों को यह पुस्तक उपयोगी होगी, ऐसी मेरी धारणा है।

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